Saturday, October 7, 2023

इस तांडव की अग्नि में सब जलकर भस्म हो जाएंगे

फिल्मों और मीडिया वालो को पैसे देकर अपने बारे में जो नैरेटिव फैलाए या बनाए है कई सालो से दुनियां के कुछ तथाकथित उच्च स्तर के खुफिया विभाग वाले उसी को लोग सच मान बैठें है। देखा जाय तो इनके असफल ऑपरेशन को भी फिल्मों में एक सफल ऑपरेशन बताकर उसपर पर्दा डालने की कोशिश की गई है। मीडिया में बढ़ा चढ़ा कर ऐसे प्रस्तुत किया जाता है की दुनिया के किसी भी कोने में कोई व्यक्ति पेड़ के पीछे खड़ा होकर चाट पकौड़ी खा रहा हो या मूत रहा हो, ये सब देख लेते है।खासकर भारत में ऐसे सुनी सुनाई कहानियों को लोग हवा देने लग जाते है, ये मिथक जोर शोर से कथक करता हुआ नजर आता भी है। अरे ये दुनिया के सबसे ताकतवर लोगो में से एक है इनसे कोई नहीं उलझ सकता है, ये अदृश्य है...! चीजे इससे भी ज्यादा पेचीदा है वास्तव में देखा जाय तो।

हमारे देश में देखा जाय कुछ भी बड़ा हमला हो जाय कही तो लोग इंटेलिजेंस फेलियर बोलना शुरु कर देते है की साहब खूफिया एजेंसियां सो रही है। अपने देश के इंटेलिजेंस पर सवाल खड़ा करने वाले उन तथाकथित उच्च स्तर की एजेंसियों से तुलना करने लग जाते है बिना कुछ जाने और समझे।
जबकि हमारी खुफिया एजेंसियों की जानकारी एकदम सटीक रहती हैं। ना कोई दिखावा रहता है ना कोई प्रदर्शन। परदे के पीछे रहकर वो अपना काम बखूबी निभाते है ,बात ये ही रहती है उसपर अमल कितना किया जा रहा है? बहुत बारी देखा गया है की जब इनकी रिपोर्ट को सरकारों द्वारा न मानने पर देश को खामियाजा भुगतना पड़ा है। चीन की नाक के नीचे रक्तविहीन तख्तापलट कर सिक्किम का भारत के राज्य के तौर पर विलय करवाने का काम हो या उससे पहले पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश की स्थापना करना हो ये सब बिना एक मजबूत खुफिया विभाग के संभव नही था। दुश्मन देश की सेना में शामिल होकर उनसे सलामी ठोकवाना हमारे ही देश के खुफिया विभाग वाले कर सकते है। किसी को कानों कान खबर नहीं लगती है , बात साफ है हम जो चाहते है , दिखाते है सिर्फ़ उतना ही दुनिया भर के लोग देख और समझ पाते है। 

अब कुछ बोलेंगे की इतनी ही खुफिया विभाग मजबूत थी तो देश के प्रधामंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कैसे हो गई?
तो बात बता दू जो सुनने में आता है एक दम साफ तरीके से की इन्हे आगाह किया गया था की सुरक्षा कर्मियों को बदल ले ,इन्हे सुझाव दिया गया था जिसको इन्होंने ने नही माना फिर वही हुआ जिसका डर था..! जिन्होंने हत्या की कौन जानता था की राष्ट्र की सुरक्षा का शपथ लेने वाले राष्ट्र अध्यक्ष के लिए भक्षक बन जाएंगे। जान बचाने वाले जानी दुश्मन बन साबित होंगे लेकिन हमारे खुफिया /सुरक्षा एजेंसियों को भनक लग गई थी अब इनकी रिपोर्ट को नही माने कोई तो इसमें इनका क्या फेलियर? यही हाल पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी का था वो रैली में गए थे जहां जाने से मना किया गया था उन्हे खुफिया विभाग वालो द्वारा लेकिन नही माने और कल के अखबार में एक दुखद समाचार छप गया था।सब चीज से खिलवाड़ कर लेना चाहिए लेकिन इंटेलिजेंस रिपोर्ट से बिलकुल भी नहीं।सुनने में तो ये भी आता है कारगिल के समय में भी इनके रिपोर्ट को दरकिनार किया गया था।तब सरकार शांति समझौता करने में व्यस्थ थी। नतीजा क्या हुआ सबने देखा ये कोई बताने वाली बात नही है।

 2014 के बाद से जब से देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल जी को बनाया गया है तब से आप देख सकते है की हमारा खुफिया विभाग कितना बेहतरीन कार्य रहा हैं। कश्मीर में आतंकवाद से लेकर पुरे देश में फैले नक्सलवाद का कमर टूट चुका है। खुफिया विभाग मजूबती के साथ सक्रिय क्या हुई देश विरोधी ताकते अपने आप निष्क्रिय गई। वरना पशुपति से तिरुपति तिरुपति तक खून खराबा होता था और लाल आतंक जाल फैला हुआ था। बात वही है न फैसले लेने की मजूबत राजनीतिक इच्छाशक्ति जिसका समर्थन पाकर खुफिया विभाग वालो ने आतंकवाद की कब्र खोद के रख दी है। पहले इनकी रिपोर्ट पर कारवाई उतनी नही होती थी जितना की अब हो रहा हैं। जैसे इंदिरा जी के समय एक्शन लिया जाता था बिलकुल वैसे ही कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। पठानकोट एयर बेस पर हमला हो , उड़ी हो या पुलवामा हमला इन सभी इस्लामिक जिहादी हमलों का मुहतोड़ जवाब दिया गया है शुरु में लोग यहां भी इंटेलिजेंस फेलियर बोलते थे लेकिन गुरु सब जानते है चूक कहा हुई थी.. 370 हटने के बाद जो कुटाई हुई है आतंकियों की वो देखने लायक है..! कई महीनों से कश्मीर एक दम शांत है कुछ घटनाओं को छोड़ दे तो। परेशान तो भारत के खुफिया एजेंसियों की हिटलिस्ट में शामिल आतंकी है जिन्हे कोई अज्ञात आकर ठिकाने लगा दे रहा है। कनाडा हो या पाकिस्तान इन अज्ञातो को घंटा फर्क पड़ता है उनका काम है ठोकना ठोक रहे है।

लश्कर के जिहादी हो या खालिस्तानी सबके स्थान विशेष में गोलियां ठोककर ये अज्ञात गायब हो जा रहे हैं। आतंकी सरगना Let हाफिज सईद के लौंडे को उठाकर चलती कार में अगले दिन ठोक दिए सब बाकी सब तो रॉ की साजिश है पाकियों की भाषा में ,पिछले साल कंधार हाईजैक में शामिल आतंकी ठोक गया था। एक तरह से देखा जाय तो वध हो रहा है वध वो भी चुन चुनकर हो रहा है अज्ञात लोगो द्वारा कभी दो पहिया वाहन तो कभी कार से। अमेरिका में सुना हु ये एक्सीडेंट होता है देश विरोधियों का..! बात वही है हमारे यहां हमले करके आनंद लेने वालो को ये नहीं पता की जब हम मुस्कुराते है तो तांडव होता है। इस तांडव की अग्नि में सब जलकर भस्म हो जाएंगे।ना जाने कौन है ये अज्ञात जो कर रहे है आतंकियों पर घात, उतार रहे है मौत के घाट नही वध कर रहे है वध। अदृश्य ताकतों को सलाम पर्दे के पीछे रहकर करते शत्रुओं का काम तमाम।

 बाकी धर्मो रक्षति रक्षितः🔥

Friday, October 6, 2023

कौवो का पूजनीय होना

 ये कर्कश स्वर सुनने को आतुर हो जाते लोग
श्राद्ध पक्ष में निष्ठुर से करुण स्वर हो जाता है
 "कांव कांव"
कौवो का घूमना गांव गांव 
फिर विलुप्त हो जाना एक पल को,
जैसे पल में धूप पल में छांव
पुत्र खोजता है नंगे पांव,
की जूठार दो भोजन चढ़ावा
पूर्वजों का पेट भर जाए
तृप्त हो जाय आत्मा
आशीर्वाद दे परमात्मा..!

जिसकी हरदम होती रही अवहलेना
कौंवो का श्राद्ध पक्ष में पूजनीय होना
दर्शाता है उचित समय और स्थिति 
आने पर सबका होता है सम्मान 
ना समय से पहले कुछ मिला न बाद।।

Sunday, October 1, 2023

जब परते खुलती है तो तरह तरह के शर्तो का पता चलता है।

1937 से लेकर 1948 गांधी जी को पांच बार नोबेल शांति पुरस्कारों के लिए नामित किया गया पर एक बार भी उन्हें इस पुरस्कार के लिए नहीं चुना गया। खुद नोबेल फाउंडेशन अपनी इस चूक को एक ऐतिहासिक गलती मानता है।पता नही कैसी गलती थी जो विंस्टल चर्चिल जैसे रक्त पिपासु को भी नोबेल दिलवा दी थी। मुझे शुरू से ही लगता है सम्मान पर गिद्ध बैठे हुए हैं जिसको चाहेंगे उसी को मिलेगा आप अपनी छवि सुधारने में अपना चरित्र बदल लेते है। हद है चाचा नेहरू ने सेना रखने से मना कर दिया था विटो तक नहीं लिया शांति के श्वेत कबूतर उड़ाने के लिए पर इन्हे भी कहा मिला विश्व का ये तथाकथित सम्मान। सबसे ख़ास बात क्या की दो बार दो व्यक्तियों को मरणोपरांत पुरस्कार दिया गया है। पहली बार एरिएक्सेल कार्फल्डट को 1931 में और दूसरी बार संयुक्त राष्ट्र के महासचिव डैग डैमरसोल्ड को 1961 में दिया गया था। 1974 में नियम बना दिया गया कि मरणोपरांत किसी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाएगा।

1906 में जब शांति का नोबेल युद्धवीर अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट को दिया गया तो इसके पतन का रास्ता का ऐसा खुला की आज तक बंद नहीं हुआ। 2012 में यूरोपियन संघ तक को मिल गया था जिसकी विभिन्न प्रकार के सैन्य अभियानों में संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता है।
बात वही है न जो सम्मान हेनरी किसिंजर, यासर अरफात और बोगिन जैसों दिया जा सकता है , तो गांधी जी और नेहरू को क्यों नही दिया गया? 
वैसे आप नोबेल की पृष्ठभूमि देख लीजिए तो इसके पीछे स्व प्रेरणा से उत्पन्न मानव या विश्व कल्याण का भाव नहीं था। डायनामाइट के आविष्कारक अल्फ्रेड नोबेल के जीवन में ही 1888 में गलती से एक अखबार ने मृत्यु का समाचार छाप दिया, "मौत के सौदागर की मृत्यु।" इसी सोच से उसने अपने धन के एक हिस्से का ट्रस्ट बनाकर वसीयत में घोषित किया कि उसके ब्याज की रकम से कल्याणकारी कार्य करने वालों को सम्मानित किया जाए। नोबेल स्वयं औद्योगिक पूंजीवाद की उपज था, इसलिए उसकी दृष्टि वहीं तक जाती थी।

बाकी हमारे देश में ही विदेशी सम्मान की चाटुकारिता जारी रही। अहिंसा परमो धर्म वाली बकलोलियां धरी की धरी रह गई सबकी। शांति का नोबेल छोड़िए क्या साहित्य में मुंशी प्रेमचंद नहीं थे? बहुत से ऐसे लोग थे जिनके आगे ये तथाकथित सम्मान का कोई अस्तित्व नही है।आज लोग दो कौड़ी का मैगसेसे पा जाते है तो उनका हल्ला हु मच जाता है मतलब क्या ही बोला जाय? तथाकथित सम्मानों से आंकलन शुरू हो जाता है व्यक्ति विशेष का... जब परते खुलती है तो तरह तरह के शर्तो का पता चलता है। बाकी मैं उजड़ा हु इतिहास एक एक पन्ना उजड़ा है

Thursday, September 28, 2023

दुखो का व्यवसाय


वो दुख लिखकर व्यथित कर देते है
मन चिंतित और कुंठित हो जाता है..
शब्दो में ऐसा प्राण वायु भरेंगे ,
दूसरो को इस कदर मजबूर करेंगे
एक दिन वो इनके रचित
इस भवसागर में डूब मरेंगे 

दुखो की समीक्षा की जाती है
सुखों को जिया जाता है
इस दुनिया में है कुछ लोग
दुखो का व्यवसाय करते है
इनकी लेखनी के बल से
हंसते लोग निर्बल हो जाते है..
सुखी लोग दुखी हो जाते है..
इसमें साथ देते है इनका
कुछ सिरफिरे आशिक,
होता है एक तरफा प्यार
जिनका नही करते इजहार
वक्त हाथ से निकल जाता है
तब होता है एहसास
मैं बोला था काश...!
शब्द नही होते इनके पास 
तब व्यक्त करता है 
दुख का व्यवसायी 
इनके शब्दो को लेकर
कलम दवात स्याही..

दुखो के व्यवसाय में
वो प्रेमी भी आते है
जिनको उनकी प्रेमिका
बीच अधर में लटका जाती है
शुक्रिया इन प्रेमिकाओं का
जो इन्हें साहित्यकार बना जाती है।।

            (२)
फिर आते है कुछ क्रांतिकारी
एवं राजनीतिक कलमकार..
समाज के स्वघोषित ठेकेदार
बहुत बड़ा है इनका दुखो का व्यापार 
कलम की धार से सुखों का संहार
फिर शुरू होता समाज में
सुनियोजित दुखो का व्यावसाय
दुखड़ा समाज का दिखाते है
अपना मुखड़ा सुधारने के लिए

धीरे - धीरे पुरे राष्ट्र में
 शुरू हो जाता है इनका
दुखो का व्यापार
यही लगाता है इनका बेड़ा पार
तख्ता पलट के लिए
 समाज का दुखी होना जरूरी है
पर सुखी समाज में इनका 
दुखित क्रांति करना
ना जाने कैसी मजबूरी है ?
सत्ता की लालच में
इनके कोरा कागज पे
सुखी जनता दुखित होती है
असत्य फैलाना भी
 एक मानसिक बीमारी है..!

यहां दुखो के व्यवसाय में
अनगिनत प्राप्त होती आय
इसके आड़ में सभाएं होती
बड़ा मुद्दा बनता है 
सामाजिक समरसता और
आर्थिक न्याय...!
कुछ यूं झूठ की बुनियाद पर
चलता है दुखो का व्यवसाय।।

Tuesday, September 19, 2023

स्याही के दलाल

स्याही के दलाल 
तय करते है 
कलम लिखेगा रंग गुलाल या
 या खून लाल...
ना इन्हे कोई मलाल
चंद पैसों में बिककर
बनना चाहते है 
मालामाल..
मिलिए इनसे
ये हैं स्याही के दलाल

काले रंग से कहते है पन्ना भरा जाता है
लाल रंग क्रांति का होता है
इससे लिखेंगे इतिहास
कहते है क्रांति खून से होती है क्योंकि 
खून का रंग होता है लाल
मिलिए इनसे 
ये हैं स्याही के दलाल

मैने भी नहीं किया अभी तक कोई मलाल
काले अक्षरों में प्रश्नपत्र लिखा होता होता है
उत्तर पुस्तिका को नीले से भरा जाता है
लेकिन मूल्यांकन तो करता है लाल
जो ये भी तय कर देते है
 कौन उत्तीर्ण होगा इस साल....
मिलिए इनसे 
ये है स्याही के दलाल..!

कुल मिलाकर स्याही लाल
 करता है जमकर बवाल
तब क्रांति क्रांति ना होकर
भ्रांति  हो जाती है
मेरे कहने पर ना मिलिए
भूलकर भी इनसे क्योंकि
ये है लाल स्याही के दलाल
क्षण भर में सर कर देंगे हलाल
फिर बोलेंगे लाल सलाम...
इसको न्यायोचित ठहरा देंगे
क्योंकि क्रांति का रंग होता है लाल।

फिर भी मिलना है तो
मिलिए इनसे 
ये है स्याही के दलाल...!

©शिवम

Saturday, September 16, 2023

वनडे विश्वकप में सचिन

सचिन ने 1992 में पहली बार विश्व कप में शिरकत की। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में हुए विश्व कप में सचिन ने आठ मैचों की 7 पारियों तीन अर्धशतकों की मदद से 283 रन बनाए। इस दौरान इनका औसत 47.16 और स्ट्राइक रेट 84.73 था।  

विश्व कप 1996
चार साल बाद दूसरा विश्व कप सचिन को अपनी घरेलू धरती 
पर खेलने का मौका मिला और क्रिकेट प्रेमियों को उनसे काफी उम्मीदें थी। 1996 में भारत , पाकिस्तान और श्रीलंका की संयुक्त मेजबानी में हुए इस टूर्नामेंट में मास्टर ब्लास्टर 523 रन बनाकर अपने समर्थकों की उम्मीदों पर खरा उतरे।इन्होंने ने सात मैचों में इतनी ही पारियों में 87.16 की औसत व 85.87 की स्ट्राइक रेट से दमदार बल्लेबाजी की। केन्या के ख़िलाफ कटक में 18 फरवरी को उन्होंने 138 गेंदों में 15 चौके व एक छक्का लगाते हुए 127 रन की पारी खेली। यह इनकी पहली सेंचुरी थी।  इसके बाद इनके बल्ले से एक और शतक निकला दिल्ली में 2 मार्च को श्रीलंका के खिलाफ 137 गेंदों में 8 चौको और 5 छक्को की मदद से 137 बनाए।
यह शतक टीम को काम नही आ सका क्योंकि श्रीलंका इस मैच को 6 विकेट जीत लिया था।

विश्व कप 1999
अब बात करते है सचिन के तीसरे विश्वकप की जो 1999 में खेला गया था। इंग्लैंड, हॉलैंड और स्कॉटलैंड के गेंदबाजी के लिए माकूल हालात में सचिन का बल्ला कुछ खास नहीं चला। उन्होंने सात मैचों की सात पारियों में एक सेंचुरी की मदद से 42.16 की औसत व 90.03 की स्ट्राइक रेट के साथ 253 रन बनाए। इस विश्व कप में इनका एकमात्र शतक केन्या के खिलाफ ब्रिस्टल में बना। जब वह 101 गेंदों में 140 रन बनाकर नाबाद पैवेलियन लौटे जो कि उस समय उनका विश्व कप में सर्वश्रेष्ठ स्कोर था। इसमें उन्होंने 16 चौके और 3 तीन छक्के लगाए थे।

विश्व कप 2003
2003 विश्व कप में सचिन अपने पूरे शबाब में थे और दक्षिण अफ्रीका, केन्या व जिम्बाब्वे की संयुक्त मेजबानी में हुए इस टूर्नामेंट में इन्होंने जमकर खेला और 11 मैचों की इतनी ही पारियां खेलते हुए एक शतक और छह अर्धशतकों की बदौलत 61.18 की औसत से 673 रन बनाए। इनके इस सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की मदद से भारत फाइनल तक पहुंचा था। बाकी सचिन ने नामीबिया के खिलाफ पीटरमैरिट्जबर्ग में 23 फरवरी 2003 को 151 गेंदों में 18 चौके लगाते हुए 152 रन बनाकर विश्व कप में अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन में सुधार किया था।

विश्व कप 2007
2007 का विश्व कप के कड़वी यादों कोई नही भुला सकता हैं। शर्मनाक और रुला देने वाला था भारत के क्रिकेट प्रेमियों को। वेस्ट इंडीज की धरती में खेले गए इस विश्व कप में भारत का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और जिस कारण वह पहले ही राउंड में बाहर हो गया। इस टूर्नामेंट में सचिन भी एकदम फ्लॉप रहे थे। वह तीन मैचों में 32.00 की मामूली औसत के साथ केवल 64 रन ही बना पाए थे, जिसमें एक अर्धशतक शामिल था। हालांकि स्ट्राइक रेट 110.34 का था।

विश्व कप 2011
अपना छठा, आखिरी विश्व कप सचिन ने 2011 में खेला था और भारत ने श्रीलंका को फाइनल में 6 विकेट से हराया था। सचिन को एक लंबा इंतजार करना पड़ा टीम को विश्व चैंपियन बनाने के लिए और भारत को 28 साल। किसी भी बेहतरीन खिलाड़ी का एक सपना रहता है की वो अपनी टीम एक विश्व कप तो जरूर ही जीतवावे। भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश की संयुक्त मेजबानी में हुए इस विश्व कप में सचिन का प्रदर्शन भी दमदार रहा। नौ मैचों में नौ पारियां खेलीं और इनके बल्ले से दो शतक और दो अर्धशतक निकले। सचिन ने 58.55 की औसत और 91.98 रन की स्ट्राइक रेट के साथ 482 रन बनाए थे।
इंग्लैंड के खिलाफ बेंगलुरू में 27 फरवरी को खेलते हुए इन्होंने 115 गेंदों में 120 रन बनाए, जिसमें 10 चौके व 5 छक्के शामिल थे। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ नागपुर में 12 मार्च को सचिन के बल्ले से फिर शतक आया 101 गेंदों में आठ चौके व तीन छक्के उड़ाते हुए 111 रन की पारी खेल डाली । यह उनका विश्व कप में छठा शतक था। चुकी इंग्लैंड के खिलाफ मैच टाई रहा था और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ हम हार गए थे रोमांचक मुकाबले में।


बेमिसाल सचिन
 'सचिन के टीम में रहते भारत को 27 मैचों में जीत मिली। इन 27 पारियों में उन्होंने तीन शतक और 12 अर्धशतक लगाए थे। सचिन ने 65.91 की औसत और 90.50 की स्ट्राइक रेट के साथ 1516 रन बनाए हैं। इनकी मौजूदगी के दौरान भारत ने 16 विश्व कप मैच हारे। इस दौरान उन्होंने 16 पारियां खेलते हुए 40.12 की औसत व 83.37 की स्ट्राइक रेट से 642 रन बनाए इसमें इनके दो शतक व तीन अर्धशतक शामिल है।

सचिन ने भारत के तरफ से खेलते हुए सबसे ज्यादा रन बनाने का गौरव प्राप्त किया। 1992 से लेकर 2011 के बीच 6 विश्व कप में 45 मैचों की 44 पारियों में 56. 95 की औसत से 2278 रन बनाए और स्ट्राइक रेट 88.98 का रहा। 6 शतक और 15 अर्धशतक कुछ कहाता है 

 सचिन ! सचिन !

सचिन! सचिन !सचिन.... की गूंज यूंही नही थी ग्राउंड हो टीवी देखते हुए या फिर किसी दूर दराज के गांव में रेडियो सुनता हुआ कोई... सबको यकीन था सचिन है किस बात का डर... तमाम परेशानियों के बीच में सचिन की पारी लोगो के जीवन में खुशियां बटोरने का काम करती थी।
क्रिकेट एक जुनून बन गया था सचिन के दौर में। स्कूल से बंक मारकर लौंडे क्रिकेट देखने चले जाते थे चाय टपरी वाले के दुकान पर मेरे जैसे लोग एक रेडियो स्कूल में छिपाकर लेकर जाते थे और क्रिकेट सुनते थे... !

©शिवम🏏
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ये झूठे मगर के आंसू सबको दिखता है

दुनिया भर के लोग शुरू हो गए है अपना भसड़ लेकर .. कश्मीर में सेना के दो और जम्मू कश्मीर पुलिस के एक अधिकारी बलिदान हो गए.. कुछ निर्लज्जो को शर्म नही आ रही है और आयेगी भी कैसे शर्म हया बेच खाए है इसमें भी अपनी घिनौनी राजनीति और एजेंडा ठेले जा रहे है...! देखने वाली बात है की दो तस्वीर या वीडियो कह लीजिए तथाकथित लोग शेयर किए जा रहे है एक में पीएम मोदी जी के ऊपर फूल बरसाए जा रहे है और दूसरा बलिदान हुए सैन्य अधिकारियों का... इससे ये साबित करने की कोशिश की जा रही है की मोदी जी को घंटा फर्क पड़ता है इससे उनको सिर्फ जश्न मनाना है। मतलब हद हैं देश का प्रधानमंत्री अपना तय किया हुआ कार्यक्रम करना छोड़ दे ? अब ये तो नही पता था न की ऐसा कोई अनहोनी होगा आए दिन कुछ भी हो जाता है लेकिन इसका मतलब ये थोड़ी न है की हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे है.. जो कारवाई है वो तो हो ही रहा है, प्रधानमंत्री अपडेट लेते ही रहते है। कश्मीर में क्या चल रहा है क्या नही उन्हें पल पल की खबर रहती है..।

पिछले 8-10 महीनो से देख सकते है कितना घुसपैठ  हुआ है.. दक्षिण कश्मीर तक पहले से बहुत शांत हो चला है , हा कुछ तो है जो इधर ही से हो रहा है जो रुकना चाहिए।  सुरक्षा एजेंसियां अपना कार्य कर रही है,कोई खलिहर नही बैठा है इतना की झूठा प्रोपोगेंडा फैलाए अपना काम छोड़कर... ये नीचता की भी हद होती है की सेना प्रमुख/सीडीएस को गुंडा कहने वाले, सुरक्षाबलो के जवानों पर आरोप मढ़ने वाले ,मानसिक रूप से कुंठित लोग अपनी घटिया स्तर की राजनीति से बाज नही आ रहे है। हैरानी वाली बात है कि ये आज हमदर्द बने हुए है जो कल तक सर्जिकल स्ट्राइक को फर्जिकल स्ट्राइक बोलते थे। जिनका मानना था की एयर स्ट्राइक में चील कौवे पेड़ मारे गए है आज वो प्रधामंत्री को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे की मोदी जी जवानों का सम्मान नही करते है।

अरे फेक नैरटिव फैलाने से सच थोड़ी न बदल जाएगा आतंकियों को मारे जाने पर शोर मचाने वालो। इन लोगो को अधिकारियों और जवानों से कोई सांत्वना नही है इनको बस एजेंडा चलाना है... पूरा विपक्ष चाहता है कैसे भी मोदी करके को हटा दिया जाय सत्ता से, इनको सत्ता से मतलब है, बाकी देश जाय भाड़ में तभी तो इनके इनके सदस्य कोर्ट में 370 और 35A को लेकर केस लड़ रहे है... हद है वो ठुल्ला बुढ़वा कहता है की पाकिस्तान से बातचीत की जाय तभी समस्या का हल होगा नही तो ऐसे ही सैनिक मारे जाएंगे.. अरे बुढ़ऊ तुम वही हो तो जो हिम्मत देखते थे की दम है 370 हटाकर दिखाओ? हट गया न क्या उखाड़ लिए .. और सुनो ये मोदी है बात कम बांस ज्यादा करता है। उतना ही बोलना चाहिए जितना चाल जाए। लेकिन एक है जिसे लगता है महाभारत वाला संजय वही है दिव्य दृष्टि वाला.. अरे मूर्ख जब वो सब देखते हुए भी कुछ नही उखाड़ पाये तो तुम क्यों इतना उड़ रहे हो.. इसका कहना है की " जब पीएम मोदी पर फूल बरसाए जा रहे थे तब जवानों पर आतंकियों द्वारा गोली बरसाया जा रहा था" अरे इतना धूर्तबाजी कहा से सिखते है भगवान ही मालिक है .. बोल तो ऐसे रहा है मानो जवानों को बाध्य किया गया था की सामने वाले को ठोकना मत ... गजब है जंगल में छिपकर अंधेरे की आड़ लेकर गोलीबारी करने वालो के खिलाफ किसी ने एक शब्द नही बोला है पर सब अपना मोदी विरोधी एजेंडा चलाने में व्यस्थ है। 

 बिल्लीमारान पकौड़ा वाला हो  या मीठा कीड़ा पत्रकार सब यही एजेंडा चलाए पड़े है .. अंतहीन सड़क वाले का तो पूछिए ही मत ये इतना हीन हो चुका है की इसकी कोई सीमा ही नही है हद पार कर चुका है ये तो.! इसका कहना है मोदी जी सांस ही क्यों लेते है? एक ये है और एक पप्पू की गलफुल्ली नेता गंध फैलाने में इनका कोई जवाब नही है। बाकी सेना से सबूत मांगने वालो इधर आतंकियो को ताबूत भी नही नसीब होता है समझ गए न,ये झूठे मगर के आंसू सबको दिखता है, हर बाजार में मछली बिकता है तो भूल जाओ तुम्हारे एजेंडे के झील में कोई डुबकी लगाने वाला है ...ओह गढ़ई है साला गंध मचाने वाला...!

Thursday, September 14, 2023

इतिहास का इतिहास

नैतिकता का ज्ञान झाड़ने वालो की कमी नही है। आज़ादी के समय भी कुछ ऐसा ही। थे कुछ लोग करते तो कुछ नही थे लेकीन जो करता था उसका विरोध करने पहुंच जाते थे। इन लोगो का अहम योगदान था देश की जनता को नपुंसक बनाने में क्रांतिकारियों के खिलाफ ऐसा माहौल बना दिए थे आम जनमानस के मन में की लोग उन्हे चोर डाकू और हत्यारा समझने लगे थे। ऐसा सत्य अहिंसा का चूरन खिलाया गया की लोग अंग्रेजो से लाठी द्वारा पीटे जाते थे और विरोध में एक घुसा तक नही जड़ते थे लाठियाते लाठियाते कितने निकल लिए नमन है इन्हे भी। दक्षिण अफ्रीका से आने वाला जो भषण वहा मचाया था पहले विश्व युद्ध में वो भारत में भी मचाया द्वितीय विश्व युद्ध में। साथ वकील का लौंडा जो कैंब्रिज से पढ़कर आया था उसने दिया। बात ब्रिटिश राज के खिलाफ युद्ध करने की थी तब भारतीय युवा इनके समर्थन में युद्ध लड़ रहे थे पूरे दुनिया भर में।कराची का मियाची ये लंदन से पढ़कर आया था वकालत पर इसको लगा था जिहाद का लत। दक्षिण अफ्रीका और गुजरात से कराची जाकर मियाची बनने वाले में बहुत समानता थी दोनो गुजराती थे दोनो की शादी कम उम्र में हुई थी दोनो विदेश पढ़ने गए थे फर्क इतना था दक्षिण अफ्रीका वाले ने अपने पत्नी का मरते दम तक साथ दिया और ये जिहादी अपने पत्नी के मरते ही दूसरी घर लाया।
दक्षिण अफ्रीका वाले तो सत्य अहिंसा की राह पर ला रहे थे लोगो को की अंग्रेजो की तरफ से लड़ो विश्वयुद्ध में ,आज़ादी मिल जाएगी लेकिन ये मियाची टक्कर देने में आगे निकला जैसे ही विश्व युद्ध शुरू हुआ मोर्चा खोल उत्पात मचायाअपने मुर्दा स्थान के लिए....!

तभी बंगाल का एक "लाला" जो अकेले निकल पड़ा था अंग्रेजो के पिछवाड़े में भाला डालने के लिए । बंगाल का बाघ जर्मनी जाकर युद्धबंदियों को उनके पूर्वजों की वीरता और मां भारती के कष्टों से अवगत कराता है ,माता के रक्त के आंसुओ कि सौगंध देता है, नींद में रहने वालों को जगाना आसान है पर मानसिक रूप से सो जानें वालो को जगाना सबसे बड़ा और महान कार्य है। जब कैंब्रिज से पढ़े इलाहाबादी वकील के लौंडे को ये जब ये पता चला उसने कहा " मैं इसका विरोध करुंगा तलवार उठाकर जब वो विदेशियों के मदद से भारत पर हमला करने आएगा तो..." खैर बंगाल का बाघ जब सिंगापुर आया तो साथ मिला दादा का जिन्होंने ने फौज बनाकर सौप दिया कहा जाओ तांडव मचा दो ! विप्लव कर दो..! खुद को बलिदान कर दो मां भारती की सेवा में...! जब जय हिन्द का नारा जोरो से लगा तब जाकर कही तख्ता पलट हुआ, नौसेना वायुसेना में भी विद्रोह हुआ। दुर्भाग्य ये की बंगाल बाघ के साथ हादसा ना जाने कैसा हादसा हुआ ,अखंड भारत का पहला प्रधानमंत्री सर्वोच्च सेनापतिकमांडर कहो या राष्ट्रपति जो था यही था मां भारती का लाल था , रहस्यों से पर्दा हटेगा एक दिन, घना कोहरा छटेगा एक दिन... !

शान्ति का श्वेत कबूतर उड़ाने वालों बंगाल का बाघ फिर दहाड़ेगा एक दिन... रहस्यमय ढंग से बाघ जंगलों में कहा गया किसको पता जब तक विरोधी जीवित रहे खौफ खाते रहे की अब बघवा आएगा सबको चीर फाड़ देगा। बाकी बाघ के राजनीतिक जंगल में खो जाने का फायदा उठाकर जिहादी मियाची अपना मुर्दा स्थान पा गया और उन्मादी इलाहाबादी वकील का लौंडा अपना टूटा सेकुलर स्थान पा गया। खंडित भारत माता को कर अपना परचम लहरा दिए आजाद हुए पर माताओं बहनों की इज्जत सरेआम नीलाम किए... रोती भारत माता की पीड़ा कौन समझने वाला था 26 हजार आजाद हिंद फौज के बलिदानियों पर कौन रोने वाला था ..जले पर नमक ये छिड़का गया की बिना खड़ग बिना ढाल देश हुआ आजाद था दक्षिण अफ्रीका वाले साबरमती का संत किया बड़ा कमाल था...! संत ने कहा था मेरे लाश पर चढ़कर देश का होगा खण्डन, लो साला बन गया आजाद देश का गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन..! चरखे वालो का परखच्चे उड़ा देने का मन करता है..  अब छोड़ों भी खुद इतिहास पढ़े लोग इतना समझाने का कौन जतन करता है। बाकी मैं तो उजड़ा हु, हकीकत लिखता हु सबको लगता रोता अपना दुखड़ा हु।

Tuesday, September 12, 2023

G20 पर विशेष चर्चा बिल्लीमारान पकौड़े की दुकान से लेकर अंतहीन सड़क तक

देश में कुछ तथाकथित लोगो को बहुत दुखी और आहत होना पड़ रहा है वो रोज होते है अपने चेले चपाटो के साथ। सबसे ज्यादा हताश निराश कोई दिखता है तो वो दो लोग है एक बिल्लीमारान में पकौड़ा बेचने वाला दूसरा अपने चैनल का काली स्क्रीन करके "कौन जात हो?" पूछने वाला .. एक नेता है जिसको सब टीपू कहते है लेकिन असल में वो औरंगजेब है। ये अपने बाप का इज्जत नही किया तो देश का क्या करेगा? इसके विदेश जाकर पढ़ लेने को ही कुछ उपलब्धि मानते है। ये G20 में G का मतलब घोसी निकाल रहे है ! अरे भिया आप घोसी में ही घुसे रहिए बाकी शासन प्रशासन ने पिछवाड़े में बांस घुसा ही रखा है। अखबारों की रिपोर्टिंग को लेकर बिल्लीमारान पकौड़े वाला आजकल ज्यादा ही ज्ञान झाड़ रहा है दुसरो को दो रुपए वाला बोलता है और अपने खुद सड़ा हुआ बेसन बांसी तिरासी उबला हुआ आलू इस्तेमाल करता है पकौड़े बनाने में और जिन अखबारों को गारिया रहा है वही इसकी पोल खोलते है । जब गरमा गरम छानकर रखता है इन बेकार अखबारों पे तो जापानी तेल महकता है कितने लोग तो पकौड़े खाने के बाद पेपर को अपने घर लेकर जाते है अब क्या करते है इसकी तहकीकात तो कोई खोजी पत्रकार ही कर सकता है, जैसे फैक्ट चेकर चिड़िया घर का मीठा भालू अपने विशेष स्थान में उस तेल को लगाकर बता देगा की ये आदानी का तेल है या जापानी का। 

सूत्रों के हवाले से खबर मिली है एक नया नया मीडिया एनालिस्ट आया है खबरों के बाजार में। जो तमाम टीवी चैनलों का विश्लेषण करता है वीडियो बना बनाकर लेकिन ये अंतहीन सड़क वाला खुद जब चैनल चलाता था तो स्क्रीन काली कर देता था और कहता है अंधेरा ही आज की सच्चाई है।अरे चचा सब जानते हैं अंधेरे की आड़ लेकर आप कौन सा किरांती कर रहे थे.... खैर पप्पू विदेश गया हुआ है इसके चमचे तस्वीर डालकर इसको पीएम बना रहे है। अरे चमचों सोना चांदी के बर्तन में खाना क्या सिर्फ पप्पू ही खा सकता है? विदेशी राष्ट्र अध्यक्षों को क्या दोना पत्तल में ,नीचे बोड़ीया बिछाकर खाना खिलाना चाहिए था..! एक पेचकस वाला इंजीनियर है ईवीएम का शोषण कर दिया था उसका कहना है G 20 से हासिल क्या होगा? अबे पेंचकस गुरु खुजलीवाल अपना पिछवाड़ा खजुआता रहता है तुम्हारे से, तुमको कौन सा चर्म सुख हासिल हुआ? 

कुछ लोगो का कुत्तापना विदेशो तक दिखा। अब क्या ही बोलूं किसी ने कहा है "आसाँ नही है कुत्ता हो जाना भी..... 
आवारा हो तो खाने पीने और अपना इलाका बचाए रखने की जद्दोजहद...... पालतू हो तो देखभाल करने वालों को खुश रखने के लिए आड़े टेढ़े करतब दिखाते रहने पड़ते हैं..." लेकिन अब आवारा कुत्तों को भी खुलकर सम्मान मिलने लगा है। वैसे इसमें तो कोई नई बात तो नही है पहले भी मिलता रहा है लेकिन अब खुलेआम दिया जाने लगा है।नोचने चोथने का काम जारी है आप डंडा तैयार रखे रहिए कब झपट्टा मारेंगे पता न चलेगा। कही- कही पर तख्ती पर लिखा होता है शराबी कुत्ते से सावधान ! पलटू चचा का कहना है हमारे राज्य में शराब पर प्रतिबंध लगा हुआ है। कुत्तों के शराब पीने का सवाल ही नही उठता है हा एक बार चूहवा सब जरूर पी गया था नौ लाख का दारू। अरे चचा सस्ता नशा करने वालो का क्या उखाड़ लोगे? अभी भेष बदलकर सुदर्शन चक्र और त्रिशूल चला देगा ठंडा जाओगे...

बाकी G 20 ना हुआ टी 20 हो गया जो छपरियो की तरह भाय - भाय हल्ला मचाये हुए है सब।

(नोट: दुखी और आहत होने का अधिकार केवल बुढ़ऊ पत्रकार को है बाकी सब से घंटा से फर्क नही पड़ता )

Sunday, September 10, 2023

वनडे क्रिकेट पतन की तरफ

2017 के बाद से देखा जाय तो क्रिकेट का स्तर बहुत बदल चुका है या कहे एक नए युग का शुरआत है। जहा पहले लोग सोचते थे की टेस्ट मैच का क्या होगा ? आगे चलकर बना रहेगा भी की नहीं? लोग टेस्ट मैच को बचाने की बात करते थे तो टेस्ट चैंपियनशिप शुरू हुआ । एक अलग ही स्तर पर टेस्ट क्रिकेट पहुंच गया है । सादे या सफेद कपड़े में खेले जाने वाले इस प्रारूप के बिना क्रिकेट रंगीन हो ही नही सकता हैं। बिना टेस्ट क्रिकेट के क्रिकेट का क्या ही वजूद।
 वजूद आज खतरे में है तो वन डे क्रिकेट का लगता है जहा से कही न कही लोगो का मन उचाट होते देख सकते है।

 कारण यह है की अब पहले जैसे वन डे प्लेयर नही रह गए है दूसरी बात इसके बदलते नियम और ज्यादा से ज्यादा टी 20 मैचों का होना । वर्तमान में देखा जाय तो हर छोटे मोटे देश में कोई न कोई टी 20 लीग या टूर्नामेंट चल ही रहा होता है।आईपीएल से बड़ा लीग तो मुझे नहीं दिखता है 2 ढाई महीने तो लोग इसी में व्यस्त रहते है। मैचों के लिए इंतेजार नही करना लड़ता है हर महीने कोई न कोई दौरा या लीग शुरू ही रहता है। वन डे क्रिकेट टेस्ट और टी 20 के बीच के कड़ी बन गई है। टेस्ट क्रिकेट में टेस्ट चैंपियनशिप की वजह से लोगो का रुझान इधर बढ़ गया है और टी 20 देखा जाय तो ज्यादा समय नही लेता है। वन डे क्रिकेट बोरिंग सा लगने लगा है पहले जैसा बात नही रह गया है ।
50 ओवर के खेल में अब कोई खास दिलचस्पी नही दिखाई देती मुझे किसी की जब तक विश्व कप ना आ जाए। पहले त्रिकोणीय सीरीज होते थे तो अलग ही आनंद आता था इसे देखने में लेकिन पिछले कुछ सालों से द्विपक्षीय सीरीज ही देखने को मिला हैं।

इंग्लैंड ने जिस तरह से वन डे खेलना शुरू किया है क्या ही बोला जाय। साढ़े तीन सौ का भी आंकड़ा कुछ नही लगता इसके। लेकिन इसी बीच जयसूर्या संगाकरा जयवर्धने मुरलीधरन जैसे खिलाड़ियों को देने वाली श्रीलंकाई टीम का जो पतन हुआ काफी निराशा जनक रहा है क्रिकेट जगत के लिए । विवियन रिचर्ड्स, माइकल होल्डिंग, गैरी सोबर्स, मैकलम मार्शल हो ब्रायन लारा हो या कृष गेल , और ना जाने कितने धुरंधर देनी वाली वेस्ट इंडीज की टीम इस बार विश्व कप में नही खेलेगी ऐसा पहली बार हुआ हो रहा है की 2 बार की विजेता टीम इस बार नही खेलगी वन डे विश्व कप में। वही दक्षिण अफ्रीका में काले गोरे वाले नियमो ने टीम की धज्जियां उड़ाकर रख दी है। ये पनौती टीम विश्वकप तो छोड़िए अब अपने नॉर्मल मैचों में भी बढ़िया परफॉर्मेंस नही दे पा रहे है। कही ना कही जिम्बांबवे इस घटिया नियम का शिकार हो चुका है वरना इनका अलग ही स्तर होता क्रिकेट जगत में। विश्व कप में सिर्फ 8 टीमों का खेलना ही बता रहा है की क्रिकेट अभी कितना पीछे है।
 वन डे क्रिकेट का एक अलग ही माहौल था जो अब पाकिस्तान से भी हो जाय भारत का मैच तो उतना मायने नही रखता है । खिलाड़ियों ने भी क्रिकेट खेलने के आलावा दुनिया भर का ठेका ले रखा है। साला वन डे क्रिकेट ना हुआ पंचवर्षीय योजना हो गया है मैच छोड़ सब होता है ढंग से।

©शिवम🏏

Friday, August 18, 2023

सुंदर शब्द और आवरण

 शब्दो के सुंदर करने से अर्थ थोड़ी न बदल जाएगा 
जो जो है वही कहलाएगा ...
क्या फर्क पड़ता है नगरबधू, गणिका कहने से
यहां सब जानते है एक दूसरे को पहचानते है
चली आ रही है पुरातन से परम्परा
 नवीन युग में इन्हे वैश्या के नाम से जानते है..
खादी पहिन लेने से कोई नेता थोड़ी न बन जाएगा
 छवि थोड़ी न बदल जाएगी
मन में पाप लेकर वस्त्रों की सुंदरता से
 अधिक दिन तक कोई थोड़ी न टिक पाएगा..
केवल  छद्म कुलीनता के मिथ्यावरण ओढ़े,
हज़ारों साल तक, जीवित रहते
हैं ये दलाल, एक ही जीवनमें मरती है कोई वेश्या
हज़ार बार,
 खादी पहन लेने भर से 
गलत मानसिकता बदल नहीं सकती, 
कुछशब्दों की सुंदरता से,
 जीवन की वास्तविकता बदल नहीं
सकती।

Thursday, August 10, 2023

पूर्वजों की विरासत


खंडहरो में धरोहरों को समेटे
कई मंदिर पड़े है टूटे फूटे
पूर्वजों की विरासत 
आने वाली पीढ़ियों के ऊपर है निर्भर
कहा तक संभाल पाती है और
कहा तक पुनः स्थापित कर पाती है?
आज भी ना जाने कितने ही खंडहर
पड़े देवी देवताओं की 
पवित्र स्थलि बाट जोह रही है
आएगा उनका सनातनी पुत्र 
उनका उद्धार करेगा ..!

कलयुग में आवतर ना लेने का प्रण ही 
तो बतला रहा है कौन है दानव 
जो कर रहा दमन और 
जो रक्षा कर रहा है वो
है सनातन..!
कहानी पुरुषार्थ की 
यूंही नही लिखी जाती है
करने पड़ते है अनगिनत त्याग 
तपना पड़ता है तपस्या में ...
तब जाकर कही धर्म की स्थापना होती है , 

वीर पुत्र रक्त बहाकर देते है बलिदान
तब कही  जाकर एक अखंड राष्ट्र की 
स्थापना होती है..!

©शिवम

Tuesday, April 4, 2023

खुदा जुदा हो गया.!

जिसे मैंने माना खुदा 
उसी से मेरा दिल दुखा 
हर कोई महादेव नहीं होता है न
जो असुरों को भी वरदान दे 
लेकिन यार मुझे तो ईश्वर शब्द से ही नफरत था 
मैं तो एक घनघोर नास्तिक था...
जिंदगी से हारा 
झूठी उम्मीदों का लिया सहारा
उसने भी कर लिया किनारा
उसका आगमन 
मेरा दमन 
करने आया था..
जीने की वजह बनकर 
मुझे बीच अंधेरे में 
चला गया अकेला छोड़कर 
हा, वही कमबख्त है जिसे 
मैंने अपना खुदा माना था....!