Wednesday, April 22, 2026

अंदमान में हिंदी का प्रचार


सन्‌ १९०६ से हम हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में सम्मान दिलाने तथा यथासंभव उपायों से उसका प्रचार करने के लिए सशत प्रयत्नरत थे। जब हम इंग्लैंड में थे तब ' अभिनव भारत' के सदस्य हर रात सोने से पहले संगठित रूप में तथा एक स्वर में अपना जो राष्ट्रीय संकल्प का पाठ करते, उसमें “हिंदुस्थान को स्वतंत्र करना, हिंदुस्थान को एक राष्ट्र करना, हिंदुस्थान में प्रजातंत्र को स्थापना करना '-इन सूत्रों के साथ ही चौथा सूत्र घोषित किया जाता-हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना, नागरी को राष्ट्रलिपि बनाना |

इस नीति के अनुसार संगठन और प्रचार करने के लिए जो भी थोड़ा अवसर प्राप्त होता, उसमें हमने सन्‌ १९११ में ही जो कार्यक्रम मन में पक्का किया, हिंदी प्रचार उसमें एक मुख्य विषय था।

उस समय यह धारणा इतनी संकुचित थी कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाया जाए, इस कल्पना को बड़े-बड़े नेता भी बचपने की बात समझते थे। साधारण लोगों के लिए तो वह अपरिचित ही थी। आगे चलकर इस आंदोलन को इतना महत्त्व प्राप्त हो गया कि लोकमान्य तिलक या महात्मा गांधी द्वारा उसका प्रत्यक्ष समर्थन करने की स्थिति भी बाद में ही आई। उस समय केवल नागरी प्रचारिणी सभा और आर्यसमाज के चंद लोग ही विशेषतः इस आंदोलन के समर्थक थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वामी दयानंद सरस्वती को यह घोषित करने का ही नहीं कि हिंदी राष्ट्रभाषा हे, अपितु उसमें ग्रंथ लेखन का भी प्रथम सम्मान प्राप्त है ।

ऐसी अवस्था में जब हम सन्‌ १९११ से सभी भारतीय राजबंदियो तथा साधारण बंदियों से हिंदी सीखने का अनुरोध करने लगे, तब इस तथ्य से ही विवाद करना पड़ता कि हिंदी भाषा है भी या नहीं ? महाराष्ट्र तथा अन्य दक्षिण के लोगों को हिंदी भाषा शब्द भी नया सा प्रतीत होता। वे उस भाषा को मुसलमानी भाषा कहा करते थे, क्योंकि दक्षिणी मुसलमानों की वही मातृभाषा कम-से-कम समाज भाषा होती है। उत्तर के बंदी जानते थे कि यह हिंदुओं की ही भाषा है और आठ करोड़ हिंदु-मुसलमान आज भी मातृभाषा के रूप में उसका प्रयोग करते हैं । परंतु फिर भी वह राष्ट्रभाषा कहलाने योग्य नहीं है, ऐसा वे कहते थे । कोई कहता, इसमें व्याकरण नहीं; कोई कहता, इसमें साहित्य नहीं | मद्रासी आदि लोगों का हिंदी को राष्ट्रभाषा न मानना स्वाभाविक था, परंतु विरोध बंगाली युवकों में ही अधिक दृग्गोचर होता था, क्योंकि उनमें स्वाभाविक महत्त्वाकांक्षा थी कि बँगला राष्ट्रभाषा हो । वास्तव में देखा जाय तो हिंदी के बाद संख्याबल की दृष्टि से बँगला ही राष्ट्रभाषा होने की अधिकारिणी है, क्योंकि चार करोड़ लोग बँगला बोलते हैं और मराठी की तरह ही साहित्य के क्षेत्र में भी वह हिंदुस्थानी भाषाओं में अग्रणी है। तथापि बंगाल के ही एक नेता श्री मित्र ने बहुत पहले ही इस बात को स्वीकार किया था कि हिंदी में राष्ट्रभाषा होने को योग्यता अधिक है। इतना ही नहीं अपितु हिंदी का समर्थन करने के लिए उन्होंने एक पत्रिका भी निकाली थी।

इन सभी आक्षेपों का बार-बार निराकरण करके मैं नाना तर्को द्वारा सभी के गले यह उतारने का प्रयास करता कि साहित्य, व्याकरण, प्रौढ़ता, भवितव्यता तथा क्षमता, इन गुणों से संख्याबल सदृश ही हिंदी राष्ट्रभाषा होने के योग्य है । इतना ही नहीं, इससे पूर्व ही अपरिहार्य रूप से वह राष्ट्रभाषा बन भी चुकी है। इसके लिए हिंदी के उत्तमोत्तम श्रेष्ठ प्राचीन ग्रंथ मँगवाए। यह सही है कि हिंदी में नवीन साहित्य नहीं है, परंतु अब उसका इतनी तेज गति से निर्माण हो रहा है कि यदि आप सभी यत्न करेंगे तो हिंदी साहित्य इतना श्रेष्ठ होगा कि पाँच-एक वर्षों में वह संपूर्ण विश्व में भी महत्त्वपूर्ण हो जाएगा। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना नहीं है, वह तो राष्ट्रभाषा है ही रामेश्वर का वैरागी और व्यापारी यही भाषा बोलते हुए हरिद्वार में पृथ्वीराज के साम्राज्य से भी पूर्व काल से आता-जाता रहा है। इस तरह के अनेक तको के साथ हम राजबंदियों को जिस तरह हिंदी सीखने के लिए प्रवृत्त करते, उसी तरह अन्य बंदियों को भी करते।

हमारा शिक्षा-क्रम ही इस तरह का था कि हर राजबंदी अन्य प्रांतीय भाषाओं का यथासंभव अध्ययन करे। अंदमान में ऐसे ज्ञानार्जन का अवसर उत्तम था। उसी तरह हम स्वयं बंगालियों को हिंदी-मराठी, मराठों को हिंदी और बँगला, पंजाबियों को उनकी और पंजाब की तरफ की गुरुमुखी आदि भाषाएँ पढ़ाते। आखिरी दम तक यह उद्योग चल रहा था। गुजराती राजबंदी सबसे अंत में आए। परंतु उन्हें भी देवनागरी लिपि और भाषाएँ पढ़ाकर उस अवधि में हमने उन्हें इतनी शिक्षा दी कि वे हिंदी पुस्तक पढ़ सकें। अन्य बंदियों को तो प्रथमतः हिंदी भाषा सिखाई जाती और उसके पश्चात्‌ अन्य। इस प्रकार दस वर्षो से हमारे और हमारे साथियों का निरंतर कार्य चल रहा था।

पीछे लिखा ही है कि इसके लिए हमने उत्तम हिंदी ग्रंथालय बनाना असंभव होने के कारण किस प्रकार चलता-फिरता ग्रंथालय बना रखा था। इस ग्रंथालय के लिए हमने धन जुटाने के विभिन्न रास्ते अपनाए थे। हमारी सहायता करने के लिए बाहर के कई स्वतंत्र अधिकारी कभी-कभी द्रव्य देना चाहते थे। हम उनसे यह कहकर कि परस्पर हिंदी पुस्तकें माँगकर दे दीजिए, वे पुस्तकें ग्रंथालय को दे देते। अंदमान में पुस्तकें मँगवाना भी चोरी थी। अतः द्रव्य सहायता, पता देना और पते पर केवल पुस्तकें मँगवाना भी सहायता ही समझी जाती। यह साहस का काम था। क्योंकि यदि सरकार को ज्ञात होता कि इसने बंदी से संबंध रखा है तो उस स्वतंत्र अधिकारी को भी पदच्युत किया जा सकता था। फिर भी वे पते देते। इतना ही नहीं, हिंदुस्थान से आए स्वतंत्र अधिकारियों में भी हिंदी प्रचार करने का कार्य चूँकि हमारी संस्था करती थी, इसलिए हिंदी सीखने के लिए उन्हें भी हमारी आवश्यकता होती थी | कई मद्रासी सज्जन-अधिकारियों को हिंदी पढ़ाने के लिए हमारे सहायक बंदी अंतःस्थ रूप से जाते। एक राष्ट्राभिमानी डॉक्टर ने तो अपनी धर्मपत्नी को भी हिंदी सिखाकर उससे बेटे के सामने भी हिंदी में ही वार्तालाप करने का अभ्यास करवाया, ताकि उसका बेटा मातृभाषा की तरह ही हिंदी सीख ले। ये सज्जन कभीकभी हिंदी प्रचारार्थ पाँच-दस रुपए दान भी करते। इन स्वतंत्र अधिकारियों को सहायता के अतिरेक में हम और अनेक प्रसंग साध्य करते | उसको स्पष्ट करते हुए दो उदाहरण रख रहे हैं।

एक साधारण अल्पशिक्षित किसान, जिसका नाम दिवाण था और जो आर्यसमाज से पूर्व परिचित था, किसी डाकेजनी के झंझट में उलझकर आजन्म कारावास का कैदी बनकर आया था। उसकी हमपर बड़ी श्रद्धा थी। उसने हमारी संस्था में प्रचुर मात्रा में कार्य किया लोगों पर उसका दबदबा था, परंतु दुर्भाग्यवश वह ऐन युवावस्था में ही अंदमान की जलवायु तथा कष्टप्रद बंदीवास का शिकार बन गया | उसके इष्ट मित्रों ने उसके नाम पर कुछ भोज आदि का प्रबंध करने की योजना बनाई | हमने उन्हें समझा-बुझाकर उन पैसों से उसके नाम पर हिंदी ग्रंथ तथा क्रमिक रूप से पुस्तकें खरीदकर ग्रंथालय तथा निर्धन बंदियों को दान करने का निश्चय किया । एक व्यक्ति को, जिसका नाम बिहारी था, फाँसी का दंड हो गया। उसने कुछ द्रव्य दान की मनौती माँगी । संयोगवश वह दंड रदूद होने के कारण उसने पूछा-वह दान कैसे किया जाए। मेरे उपदेश से ये भोज-प्रसंग लगभग बंद ही हो गए थे। ग्रंथों के तथा ज्ञान प्रसारार्थ ज्ञान दान करने की योजना बनाएँ तो सिख, उर्दू, अंग्रेजी प्रत्येक वर्ग कहता-- वह दान अपनी भाषा की पुस्तकों को मिलना चाहिए। हमारे विरोध करने पर वे कहते राष्ट्रीय भाषा का चिकना-चुपड़ा ढोंग करके बँगला, पंजाबी आदि भाषाओं को खत्म करना चाहता है। परंतु हम कहते, मैं अपनी मराठी के लिए दान नहीं माँग रहा हूँ । यदि ऐसा हो तो आपका संदेह ठीक है, पर हिंदी के लिए दो। मैंने स्वयं गुरुमुखी सहित उन सारी प्रांतीय भाषाओं का अध्ययन किया था। अन्य लोगों को बँगला आदि स्वयं पढ़ाता भी था | क्‍या मुझे मराठी की-अपनी ही भाषा की हत्या करनी है ? परंतु राष्ट्रीय हित के सामने अपने प्रादेशिक अभिमान का बलिदान देना ही होगा। इस तरह उन्हें समझाते हुए अंत में उन पैसों से हिंदी पुस्तकें मँगवाने के लिए हमने उन बंदियों को तैयार किया और आल्हा-ऊदल सदृश लोकप्रिय किंतु प्राचीन शैली के ग्रंथों से लेकर नागरी प्रचारिणी की नवीनतम ग्रंथमाला तक सौ-एक रुपयों के ग्रंथ मँगवाए। हमें स्वयं भी आल्हा ग्रंथ अत्यधिक प्रिय था।

उस बंगाली स्नेही को, जो हिंदी को प्रौढ़ भाषा नहीं समझता था अथवा उसके अनुसार हिंदी में साहित्य नहीं था, यह दिखाने के लिए कि वह कितनी गमनशील है, हिंदी के गुरुकुल स्थित अथवा उत्तमोत्तम ग्रंथ प्रकाशित होते ही उन्हें मँगवाकर दिखाता। कभी-कभी उन्हें यह संतोषजनक प्रतीत न होता और उसमें अपमानजनक कम-से-कम किसी दुष्टतापूर्ण हेतु की गंध आती। परंतु उस हेतु प्रतिकूलता को भी सहते हुए मैं यह करता ही रहा। अंत में यह मान्यता कि हिंदी राष्ट्रभाषा है, इतनी सार्वजनिक हो गई कि वह सिद्ध करते रहने की स्थिति से सिद्धांत को स्थिति तक पहुँच गई | सिखों का मन हिंदी की ओर करने के लिए एक भिन्न युक्तिवाद तर्क उपयुक्त होता | उनमें से कई सरदार इस सत्य से अनभिज्ञ होते कि श्री गोविंद गुरु का ' विचित्र नाटक' आदि ग्रंथ और ' सूर्य प्रकाश' आदि इतिहास शुद्ध ब्रजभाषा में अर्थात्‌ प्राचीन हिंदी में हैं। परंतु एक बार उन्हें यह समझाया कि किस प्रकार हिंदी उनको धर्मभाषा है और गुरुमुखी मात्र एक लिपि है, तो फिर उन्हं हिंदी का महत्त्व न केवल राष्ट्रीय दृष्टि से वरन्‌ पंथ की दृष्टि से भी पूर्णतया मान्य हो गया।
कारागारीय ग्रंथों के अध्ययन से गुरुमुखी के संबंध में हमारा अभिप्राय इस प्रकार था कि परंपरा से प्रचलित यह मत कि इस लिपि को गुरु ने खोजा है, ऐतिहासिक नहीं है। उसका बस इतना ही अर्थ है कि उस समय पंजाब में प्रचलित लुंडी-मुंडी (मोड़ी) आदि व्यापारिक तथा सामान्य जनों की लिपियों में से गुरु द्वारा चुनी गई वह एक पुरानी लिपि थी। सिख धर्मग्रंथ ' शास्त्री ' (नागरी) में न लिखते हुए सांधारण लोगों में प्रचलित उस लिपि में लिखवाए गए जैसे गौतम बुद्ध ने पाली में । हो सकता है, इसीलिए उसे गुरुमुखी नामाभिधान प्राप्त हो गया। यह स्वतंत्र विषय है। बातों-बातों में विषय छिड़ गया था, इसीलिए उल्लेख किया है। हमें उस समय भी यह ज्ञात था कि आज तक किसी भी विद्वान्‌ ने इस उपपत्ति का समर्थन नहीं किया था। उसकी यथार्थता अथवा अयथार्थता का दायित्व जब तक मुझे ज्ञात है, मेरा है। इस संबंध में अनेक ' ग्रंथों' और सिख इतिहास के विद्वानों से हम कई बार चर्चा भी करते थे।

प्रथमत: मैं मराठी भी किसीको पढ़ने नहीं देता। क्यों? प्रथम मातृभाषा, फिर तुरंत हिंदी और इसके पश्चात्‌ अन्य प्रांतीय हिंदू भाषा--इस तरह क्रम रखा था। जहाँ तक हो सके प्रत्येक को अन्य प्रांतीय भाषा पढ़ने का अनुरोध करता, परंतु तमिल संघ की (मलयालम, तेलुगु, कन्नड, तमिल) द्रविड़ भाषाओं को पढ़ाने की सुविधा--उनके ग्रंथों का संग्रह और प्रचारक न होने से और मेरे लिए वह ग्रीक-लैटिन के बराबर होने से मैं प्रबंध नहीं कर सका | इसमें मैं हमेशा ही अपनी न्यूनता समझता। आज भी उस कमी को मैं पूरा नहीं कर पाया हूँ। शेष मराठी, पंजाबी, बँगला भाषाएँ प्राय: सभी राजबंदियों तथा शिक्षित बंदियों को अच्छी तरह से अवगत थीं। मराठी के महत्त्वपूर्ण विशेष ग्रंथ भी वे पढ़ते। तथापि मैं इसकी सूक्ष्म जानकारी नित्य ही प्राप्त करता कि द्रविड़ भाषा में कौन-कौन से नए ग्रंथ हैं; और आखिरी-आखिरी दिनों में पर्यवेक्षकों से उन भाषाओं की प्राथमिक पुस्तकें तथा अन्य नए ग्रंथ मँगवाने की अनुमति तथा पैसे लेकर एक टिप्पणी करके उन्हें मँगवाया भी, परंतु मेरी आकस्मिक वापसी के कारण मुझे कुछ भी पता नहीं चला कि आगे उसका क्या हुआ।

अंदमान में विभिन्न प्रांतीय लोगों के एकत्रित होने के बाद उनमें बोलचाल को भाषा अपने आप ही हिंदी होती है। उधर बंदियों की जो संतानें हैं, उनमें भी परस्पर प्रांतीय लोगों में ब्याह होने के कारण अंदमान में जन्मे बच्चों की मातृभाषा सहज ही हिंदी होती थी | इन ' स्वतंत्र' लोगों में बहुलांश में हिंदू लोग ही थे, इसलिए पाठशालाओं में प्रमुखतः हिंदी में ही शिक्षा देनी चाहिए थी। परंतु पूर्व काल से ही हिंदुस्थान के जो 'मुंशी' के रूप में वहाँ गए वे ata, दिल्ली आदि के उर्दूशिक्षितों में से होने के कारण अंदमान की प्राथमिक पाठशालाओं में उर्दू पढ़ाने की परिपाटी बन गई | इसका एक और अन्य कारण यह था कि कार्यालयों (Offices) में उर्दू नौकरों की ही भरमार होने के कारण वहाँ दफ्तर की दूसरी भाषा उर्दू ही हो गई थी ।

पहली पाठशाला से बाहर निकले उदू-शिक्षित छात्रों के उदाहरण से शिक्षित का अर्थ है उर्दू-शिक्षित। इस प्रकार इस नए उपनिवेश में विचित्र धारणा बनकर लोगों में हिंदी शिक्षा ग्रहण करने की इच्छा तो क्या, कल्पना भी शेष नहीं रही । जैसेजैसे पाठशालाओं की संख्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे उनमें उर्दू शिक्षा की ही परिपाटी चलने लगी । वास्तविक दृष्टि से देखा जाए तो हिंदी और जिसे उर्दू कहा जाता है, उसमें मूलत: कोई भेद नहीं है । हिंदी भाषा, फारसी लिपि में लिखो, बस हो गई उर्दू अत: वास्तव में मूलभूत प्रश्‍न लिपि का था। अंदमान में बंदियों तथा बाशिंदों की संख्या में मूलत: हिंदुओं की ही सतत भरमार होने के कारण और शिक्षा ग्रहणार्थ उन्हीं लोगों के अधिकांश आगे बढ़ने के कारण उन सभी को पाठशालाओं में पहले से ही हिंदी अर्थात्‌ नागरी लिपि ही पढ़ानी चाहिए थी, जो राष्ट्रीय एकता एवं धार्मिक एकता की द्योतक तथा प्रिय है । परंतु आश्चर्य की बात यह है कि उन पाठशालाओं में, जो मुख्यत: हिंदुओं के करों पर चलाई जाती हैं, आज भी सही ढंग से हिंदी नहीं सिखाई जाती। हिंदू बालक अ, आ, क, ख, ग, नहीं जानते, 'तुलसी रामायण' अथवा ' भगवद्‌गीता ' के श्लोक वे नहीं पढ़ पाते, उन्हें पर्शियन कवियों के चुटकुले कंठस्थ होते हैं कालिदास तो रहने दीजिए, सूरदास अथवा प्रेमसागर की एक पंक्ति से भी वे परिचित नहीं होते-हिंदी की प्रथम पुस्तक उन्हें ग्रीक-लैटिन समान प्रतीत होती है । परंतु उर्दू समाचारपत्र वह बिना बाधा फर्राटे से पढ़ता है। उसके मस्तिष्क की उपमाएँ पर्शिया एवं अरेबिया स्थित नदियों से भरी रहती हैं । वहाँ के वीर पुरुष उन्हें ज्ञात हैं, परंतु पांडव क्या, महाभारत, रामायण अथवा भागवत का एक अक्षर भी उन्हें ज्ञात नहीं होता, न ही वे पढ़ सकते हैं । अंदमान के हमारे जैसे शिक्षित लोगों में से साधारण मनुष्यों की इस स्थिति का अवलोकन करने के बाद हमारी यही राय बनी कि अंदमान में हिंदू संस्कृति जीवित रखनी है तो हिंदी भाषा एवं नागरी लिपि की शिक्षा प्रत्येक हिंदू बच्चे को सर्वथा अपरिहार्य रूप में देने के लिए सतत आंदोलन छेड़ना अत्यावश्यक है।

प्रत्येक पाठशाला में हिंदी भाषा एवं नागरी लिपि शिक्षा का अनिवार्य माध्यम हो और जिस मुसलमान बच्चे अथवा अन्य लोगों को उर्दू लिपि और भाषा (अरबी, पर्शियन शब्द, प्राय: हिंदी) सीखनी है, उन्हें वह भाषा के रूप में विशेष विषय के रूप में पढ़ाई जाए। अंदमान के स्कूलों में यह व्यवस्था करने के लिए प्रथमत: लोगों में यह इच्छा उत्पन्न करना आवश्यक था।

क्योंकि वहाँ के हिंदू लोगों में सार्वजनिक एवं राष्ट्रीय एकता की भावना अत्यल्प थी और हिंदुत्व का अभिमान केवल मूर्खतापूर्ण रूढि के रूप में जीवित मात्र था। उन्हें इस बात का बिलकुल ज्ञान नहीं था कि हिंदी हिंदुओं की अपनी भाषा है और अपने धर्मग्रंथ, कम-से-कम प्राकृत, जिस नागरी में होते हैं वह लिपि तथा वह भाषा सीखना अपना परम पावन कर्तव्य है। दो-तीन पीढ़ियों से उर्दू के संपर्क से उसका केवल वर्चस्व ही नहीं, अपितु आत्मविनाशक अभिमान का भी उनमें संचार हुआ था। अतः बाहर हमारे विचारों के जो लोग थे, उन्होंने स्वतंत्र लोगों के घर-घर इस विषय की चर्चा करने और जागृति लाने का साहस से श्रीगणेश किया।
जिस अध्याय में हमने अंदमान के संगठन, शिक्षा, शुद्धिकरण आदि आंदोलनों का इतिहास इससे पूर्व दिया है, उससे बंदियों एवं बाशिंदों में समाचारपत्र, समाचार, राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रीय चर्चा, अंतःस्थ सभा तथा व्याख्यान आदि साधनों द्वारा पाठकों ने गौर किया ही होगा कि हमारी संस्था के प्रचारकों ने कितनी जागृति फैलाई । उन आंदोलनों में प्रथमत: ही ' स्वतंत्र' लोगों में हिंदी का प्रचार करना कर्तव्य था। इस योग से उन पाँच-छह वर्षों में स्वतंत्र लोगों में हिंदी से संबंधित विपुल जागृति आई।

कई परिवारों में हिंदी अध्यापक भिजवाकर हमने बच्चों को नागरी तथा हिंदी पढ़ाई। जब तेल कोठार का व्यवस्थापन हमारे पास आ गया तब व्यवसाय के बहाने जो स्वतंत्र लोग कारागृह में आते उनसे हमारा परिचय होने लगा। केवल हमें देखने अथवा मिलने के लिए कई स्वतंत्र लोग तेल और भूसी को खरीदते, ताकि कम-सेकम उसी बहाने कारागार में प्रवेश पाकर उस गोदाम में हमसे भेंट हो जाए। ऐसे सभी लोगों को अन्य उपदेशों के साथ यह भी उपदेश देते कि 'तुम लोग हिंदू हो, हिंदी तुम्हारी राष्ट्रभाषा नहीं तो कम-से-कम अंदमान में तो धर्मभाषा है । तुम्हें अपने बाल-बच्चों को तो हिंदी और नागरी लिपि अवश्य सिखानी होगी।

तुम सब मिलकर सरकार को एक आवेदनपत्र भेजो तो स्कूलों में हिंदी और नागरी अवश्य प्रारंभ होगी। परंतु जब तक वह प्रबंध नहीं होता तब तक तुम लोग अपने-अपने घरों में हिंदी पढ़ाओ।' हमारे स्वयंसेवक किसीके ' हाँ' कहते ही उसके घर में प्रकट रूप में अथवा अंतःस्थ रीति से जाकर हिंदी पढ़ाते, क्योंकि अंदमान में इच्छा होते हुए भी स्वतंत्र रूप में किसीके घर बिना अनुमति कोई भी बंदी सहसा नहीं जा सकता था। “स्वतंत्र को भी बंदी से बात करने अथवा किसी तरह के व्यवहार की स्वतंत्रता नहीं थी। हमें जो भी कोई मिलता, उससे हिंदी सीखने की प्रार्थना करते। मुंशी आया, चलो हिंदी सीखो; लेखक आया, हिंदी सीखो; डॉक्टर आया, हिंदी सीखो-इस तरह हमारा अविरल जाप होता रहता।

स्वतंत्र लोगों में हिंदी-शिक्षा का इस तरह थोड़ा-बहुत प्रसार होते ही उनके बच्चों के लिए हिंदी में महाभारत आदि पुस्तकें, शिवाजी आदि महापुरुषों के चरित्र निःशुल्क बाँटे जाते। उनके घर हिंदी समाचारपत्र पहुँचाकर उनसे पढ़वाए जाते। जो सिपाही, व्यापारी आदि लोग हमसे आखिर-आखिर में प्रत्यक्ष मिल सकते थे, उन्हे हम स्वयं हिंदी पढ़ाते। इस तरह प्रयास करते-करते स्वतंत्र लोगों में यह भावना प्रचुर मात्रा में बढ़ गई कि कम-से-कम अंदमान में तो प्रत्येक हिंदू का यह धार्मिक कर्तव्य है कि वह हिंदी सीखे और उस भावना के बलबूते पर वहाँ के स्कूलों में कम-सेकम हिंदू बालकों को तो हिंदी पढ़ाई जाए। इस प्रकार सरकार को आवेदन करने का प्रयास भी आरंभ हो गया।

परंतु यह देखकर कि जब तक सरकारी दफ्तर को भाषा उर्दू है, तब तक बच्चों की रुचि साधारणतः उर्दू सीखने की ओर अधिक होगी। तब जहाँ संभव था उस स्थान पर दफ्तर की भाषा ही हिंदी करने का हम प्रयास करने लगे। वास्तव में प्राय: सब सरकारी दफ्तर अंग्रेजी में ही होते।
जो उर्दू भाषा में होता, वह इसलिए नहीं कि उस तरह का कोई नियम था, अपितु था पहले-पहले उत्तरी क्षेत्र के हिदुस्थानी मुंशी आते रहने और बंदियों में भी उत्तर के उर्दू लिखित प्रांतों के लोगों की ही भरमार होने से वह एक परिपाटी या रूढ़ि बन गई। इस उर्दू भाषी दफ्तर में प्रमुख हिस्सा जहाज से जा रहे बंदियों की चिट्ठी-पत्रियों का होता। ये पत्र 'मुंशी' द्वारा लिखवाए जाने से प्राय: उर्दू में ही होते। अत: इस तरह अनुमति प्राप्त करने का प्रयास किया गया कि पत्र देशी भाषाओं में हों।

'मराठी', गुरुमुखी ' आदि भाषाओं में पत्र-व्यवहार करने के लिए अनुमति के प्रयास करने में कई दिन बीत गए, क्योंकि मुंशी अंग्रेजी अथवा उर्दू जानते थे और मुंशी द्वारा पत्र पर सम्मति मिले बिना उसे “उपयुक्त नहीं समझा जाता। अंत में जब यह अनुमति मिल गई कि बंदी अपनी प्रांतीय भाषा में पत्र लिख सकता है, तब पंजाब, लखनऊ आदि उन प्रांतों के, जहाँ उर्दू प्रचलित थी, हिंदू बंदी का मत परिवर्तन किया गया कि पत्र हमेशा हिंदी में ही भेजा जाए। मराठी, बंगाली आदि हिंदू बंदियों से अंत:स्थ रूप से जोर-शोर से यह कहने लगे कि या तो वे पत्र अपनी मातृभाषा में लिखें या हिंदी में, परंतु उर्दू में कदापि नहीं। अत: उच्च कार्यालय में यह देखने के लिए कि वह पत्र नियमानुकूल लिखे गए हैं या नहीं, ऐसे मुंशी नियुक्त किए गए जो हिंदी तथा अन्य देशी भाषा जानते थे। पुराने अधिकारी जो उर्दू जानते थे, स्वयं आगे बढ़कर हिंदी नागरी का ज्ञान संपादन करने लगे।

हिंदी पत्र लेखनार्थ मुंशी नहीं मिलने पर हमारे लोग वह काम स्वयं करते । इससे पूर्व हमारे कारागार में नब्बे प्रतिशत उर्दू में पत्र भेजे जाते थे, परंतु प्रयासों के चलते अंत में नब्बे प्रतिशत पत्र देशी भाषाओं में और विशेषत: हिंदी नागरी में जाने लगे। आगे चलकर उन लोगों में भी, जिन्हें मुंशी आदि को नियुक्त करने का अधिकार था, हिंदू संगठन के अभिमानी हिंदू लोग ही नियुक्त किए जाते।

उसी तरह ऐसे मुंशियों की नियुक्ति की जाती जो हिंदी जानते थे । हमारी संस्था के लोगों के प्रयासों से इस तरह अलिखित-स्वयं-सम्मान नियम ही हो गया कि हिंदू को पत्र हिंदी में ही लिखना चाहिए--अधिक-से-अधिक अपनी प्रांतीय हिंदू भाषा में। मुसलमान बंदी चाहे तो उर्दू में पत्र लिखें, उसपर कोई जबरदस्ती नहीं की गई। परंतु इससे पूर्व किसी भी बंदी को महाराष्ट्र में अथवा बंगाल में भी प्रायः जो उर्दू में ही भेजना अनिवार्य था, वह जबरदस्ती हमने तोड़ डाली।

जब हम कार्यालय में जाने लगे तब हम स्वयं सभी बंदियों के पत्रों को तलाशी लेकर देखते कि कहीं कोई हिंदू अकारण उर्दू में तो नहीं लिख रहा । तुरंत उसके पास जाकर हम उसका मत परिवर्तन करते | इस तरह करते-करते जगह-जगह पर हिंदू मुंशियों की, जो हिंदी जानते थे, नियुक्ति कराकर पत्र-व्यवहार बहुश: हिंदी में आरंभ कराया गया। वही बात आनेवाली डाक की थी। क्योंकि यह प्रयास हो रहा था कि प्रत्येक हिंदू बंदी अपने संबंधियों को लिखे कि उत्तर हिंदी में ही भेजा जाए। इससे आनेवाले पत्रों में हिंदू प्रांतीय भाषाओं तथा हिंदी में लिखे पत्रों की संख्या बढ़ने लगी | यह देखने के लिए कि वे सरकारी दृष्टि से उपयुक्त हैं या नहीं, हिंदी मुंशियों की आवश्यकता बढ़ गई। उर्दू का महत्त्व और प्रचार कम होने लगा।

केवल राजबंदियों का अंग्रेजी में ही पत्र भेजना लगभग अनिवार्य होता, क्योंकि उन पत्रों का स्वत: अंग्रेज अधिकारी अन्वेषण करते। आगे चलकर जब सैकड़ों राजबंदी यहाँ आ गए तब अनेक को अंग्रेजी न आने से पत्र स्वभाषा में भेजने की अनुमति--वह भी बहुत प्रयासों से--मिल गई। हमें अंत तक अंग्रेजी में पत्र भेजना अनिवार्य था।

जो स्थिति पत्र-व्यवहार की थी, वही टिप्पणियों, सरकारी कार्यालय तथा कार्यालयांतर्गत निम्न वर्गीय अधिकारियों के कार्यों, दैनिक, छिटपुट सरकारी पत्रव्यवहार और दफ्तर की भी हो गई | पहले यह सब उर्दू में था, परंतु जैसे-जैसे हिंदू “मुंशी' और अधिकारी उर्दू न लिखने का ब्रत लेने लगे वैसे-वैसे यह काम भी हिंदी में ही होने लगा। धीरे-धीरे उर्दू को निकालकर हिंदी एकमात्र लिपि नहीं हुई, तथापि ऐसा स्पष्ट प्रतीत होने लगा कि वह उसके साथ सम्माननीय सरकारी भाषा तथा लिपि होगी।

स्वतंत्र लोगों में शादी-ब्याह की पत्रिका भी हिंदू लोग उर्दू में छापते थे, परंतु इसके पश्चात्‌ कई लोग हिंदी में छापने लगे। उन्हें पढ़ना भी कठिन हो रहा था, क्योंकि शिक्षित हिंदू केवल उर्दू-शिक्षित था। फिर भी वैसे ही प्रवाह चला कि अधिक-से-अधिक पत्रिकाएँ हिंदी और उर्दू--इस प्रकार दोहरे काजग पर छापी जाएँ। कम-से-कम उर्दू में ही छापी गईं तो ऊपर ॐ और नीचे कुछ नागरी वाक्यों को छापें और लिखें। बाद में इस प्रकार की परिपाटी प्रचलित हो गई।

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इतने सारे गोरखधंधों के चलते इसका विरोध भी हो ही रहा था, परंतु आश्चर्य यह कि न केवल मुसलमान अधिकारियों द्वारा विरोध हो रहा था, प्रत्युत अंग्रेज अधिकारियों द्वारा भी विरोध हो रहा था। वे हिंदी के विषय में सशंकित रहते। एक कारण यह था कि वे भी उर्दू जानते, हिंदी नहीं; और दूसरा कारण हिंदी के आंदोलन को हमारा प्रबल समर्थन था।
अत: वे नित्य सशंकित रहते | हिंदी पुस्तक मँगवाने के लिए हम एक बंदी को अनुकूल कर रहे थे कि 'तुम उर्दू पुस्तकें मँगवा रहे थे न, तो अब हिंदी क्यों मँगवाने जा रहो हो ' इस प्रकार उससे प्रश्न पूछकर उसका मत परिवर्तन करने के लिए भी एक अंग्रेज अधिकारी तत्पर था | जब पाठशालाओं में हिंदी पढ़ाने के लिए हमने स्वतंत्र आंदोलन छेड़ा और वह सफल होने लगा तब 'स्वतंत्र लोगों में हमारा नाम होगा और हमारा प्रभुत्व बढ़ जाएगा '--मुसलमान अधिकारी इस प्रकार की रिपोर्ट स्पष्ट रूप में गुप्तचर विभाग की पुलिस तथा उच्चाधिकारियों को भेजने लगे।
उन्हीं बंदियों ने मुख्यत: हिंदी का आंदोलन छेड़ा था जो आर्यसमाज, शुद्धि, राजनीति प्रचार, शिक्षा, अन्याय का प्रतिरोध आदि कार्यो में सतत नेतृत्व करते रहे थे और सरकारी दफ्तर में ' आंदोलनकारी, भयंकर संदेहास्पद व्यवहारवाले ' जैसे ढेर सारे उपपदों से गौरवान्वित थे। इस प्रकार सरकार के बिना किसी कारणवश संदेहास्पद दृष्टि से देखने से स्वतंत्र लोगों की माँग होने पर भी स्कूलों में हिंदू बालकों के लिए हिंदी को अनिवार्य करना असंभव हो गया। हमारे आने पर भी संभव नहीं हुआ। हम लोगों के मन पर सतत अंकित किया जा रहा था कि यदि वहाँ के स्वतंत्र लोग अविरत प्रयास करेंगे तो सरकार को यह बात ज्ञात होगी कि अपना संदेह निपट पागलपन है और वह अंदमान को पाठशालाओं में कम-से-कम हिदुंओं को तो हिंदी तथा नागरी अनिवार्य रूप में पढ़ाने की अनुमति देगी।

कन्याओं को हिंदी नागरी शिक्षा

यद्यपि लड़कों की पाठशालाओं में हिंदी, नागरी अनिवार्य नहीं की जा सकी, तथापि उसी दौरान स्थापित कन्या पाठशाला में उस आंदोलन को सफलता प्राप्त हो Te इन कन्याओं को भी उर्दू में ही शिक्षा दी जानेवाली थी । हिंदी का कुछ भी प्रबंध नहीं रखा गया था। परंतु समय पर ही स्वतंत्र लोगों को सतत लज्जित करके, चिढ़ाते , हुए कन्याओं को तो अलिफ, बे, पे आदि उर्दू वर्णमाला (हरूफ) पढ़ाने के लिए मुसलमान मौलवी के हाथों सौंपने की विघातक प्रवृत्तियों से विमुख किया गया और पहले से ही कन्या पाठशालाओं में हिंदू कन्याओं को हिंदी, नागरी पढ़ाने की व्यवस्था की गई | यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि राजबंदियों में भी पंजाब आदि प्रांतों

के लोगों ने उर्दू में पत्र न भेजते हुए अपनी हिंदी भाषा में भेजना आरंभ किया। राजबंदियों में पंजाबी आदि लोगों में उर्दू के अच्छे शायर एवं नामवर लेखक भी थे। उनमें से कइयों ने प्रथमतः सहज भाव से ही हमारे विरुद्ध आंदोलन का प्रतिकार किया, परंतु आगे चलकर राष्ट्रभाषा की दृष्टि से किस तरह उर्दू अपनी साख जमाना चाहती है, आदि युक्ति, तर्क, उनके गले उतारे, तब उनमें से कुछ लोगों ने हमारे सामने ' आज से यह उर्दू कलम तोड़ दी, ' इस प्रतिज्ञा के साथ हिंदी में लिखना आरंभ किया। उन्हें प्रथमतः ' आकाश, व्यायाम' आदि सरल शब्द भी सिखाने पड़े, इतना उनका मन उर्दू ने अहिंदू कर छोड़ा था। परंतु उन्होंने उन कष्टों को झेला और उच्च नागरी हिंदी सीखते गए।
मेरा यह आंदोलन उर्दू के प्रति विद्वेष भावना से नहीं छेड़ा गया था, क्योंकि मैं स्वयं उदू सीख रहा था और पढ़ता भी था। आज भी साधारण टफ तक उर्द मैं पढ़ सकता हूँ । काफी समझ भी सकता हूँ । वह एक लिपि और किंचित्‌ उपभाषा के रूप में हिंदू-मुसलमानों में सूखे नैन जीवित रहे । हमारे मुसलमान देशबंधुओं में से कुछ लोगों की भाषा होने से हम भी उसका आंशिक ममतापूर्वक जतन करेंगे। परंतु हिंदुओं के परिश्रम तथा प्रोत्साहन से वह इतनी नकचढ़ी हो जाए कि हिंदुओं को ही “हिंदी भाषा छोड़ो और मुझे अपनी राष्ट्रभाषा बनाओ' कहते हुए धमकाए, धौंस दिखाए, यह हम कदापि सहन नहीं करेंगे।
बस, यहाँ तक ही हम उसका प्रतिशोध करेंगे। अपने व्यय से चलाई हुई पाठशालाओं में हिंदुओं की उनकी अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी अनिवार्यत: पढ़ाए जाने और इस माँग के न्यायसंगत प्रतीत होने तथा उर्दू का बलपूर्वक थोपना अन्याय तथा परिणामत: हिंदू संस्कृति के लिए विघातक प्रतीत होने से हम यथासंभव उर्दू का उच्चाटन करते रहे । भाषा अथवा लिपि की दृष्टि से कोई भी हिंदू उर्दू सीखे। जैसे हम फ्रेंच, जर्मन पढ़ते हैं वैसे ही उर्दू भी सीखें, परंतु राष्ट्रभाषा अथवा स्वभाषा के रूप में अपनी संस्कृतोत्पन्न तथा पूर्वजों की हिंदी भाषा त्यागकर उर्दू को अपने सिर पर नचाना, उसे मुँहजोर बनाना हमें अनिष्टप्रद प्रतीत होता है।

अंदमान में हिंदी पुस्तकों की भरमार करते हुए चलते-फिरते गोपनीय ग्रंथालय कैसे थे, इसका संक्षिप्त वर्णन पीछे ग्रंथालय प्रकरण में आया ही है। चलते-फिरते इस ग्रंथालय में हिंदी अर्थशास्त्र, राजनीति, राजनीतिक आंदोलन आदि नवीनतम पुस्तकें सतत आती रहती थीं, जिससे साधारण बंदियों के लिए न केवल प्रचलित वरन्‌ उच्च विषयों का ज्ञान भी बहुत कुछ सुलभ होता गया।

“सत्यार्थ प्रकाश" ग्रंथ के पठन को ओर तो हम नित्य ही विशेष ध्यान देते । राजबंदियों से उसे बार-बार पढ़वाते। इसमें कोई संदेह नहीं कि दयानंद का यह ग्रंथ कुछ तात्कालिक संग्राम से उड़ी धूल तथा धुएँ का अंश छोड़कर एक अदम्य तथा निर्भीक प्रचारक ही है, जो मन पर हिंदू संस्कृति के उच्च तत्त्व अंकित करते हुए हिंदू धर्म का राष्ट्रीय स्वरूप व्यक्त करता है। 

हिंदी पढ़ने में प्रवृत्त करने के लिए कभी-कभी हम वहाँ के बंदियों तथा उर्दू-शिक्षित स्वतंत्र युवकों को छात्रवृत्तियाँ भी प्रदान करते। यद्यपि प्रथम पैसे लो, पर सीखो अवश्य, इस तरह का आंदोलन छेड़ना पड़ा, तथापि आगे हिंदी की रुचि इतनी बढ़ गई कि पुस्तकें ही पूरी नहीं पड़ती थीं। यह शिकायत बंद हो गई कि पुस्तकें धूल में सनी यूँ ही व्यर्थ पड़ी हैं। अब यह चुगली कानों में पड़ने लगी कि लगातार लोगों के हाथों में जाती हुई पुस्तक मैली हो जाती है । मैं कहता--यह सुनने से कि पुस्तक व्यर्थ पड़ी है, मुझे यह शिकायत सुनना अधिक अच्छा लगता है कि वह पढ़-पढ़कर फट रही है।
जिस अंदमान के घर-घर में उर्दू हिंदू लोगों के मन कुतर-कुतरकर उन्हें इतना खोखला बना रही थी कि हिंदू कन्याएँ भी आपस में पूछतीं, ' तुम्हारी शादी है ?' परंतु लगन, विवाह आदि शब्दों का अर्थ उनके पल्ले नहीं पड़ता था, उसी अंदमान में अब हिंदी भाषा तथा नागरी लिपि हमारी धर्मभाषा एवं धर्मलिपि है, यह भावना हिंदू जनता में बच्चों तक दृढ़मूल हो गई तथा हिंदी पढ़ने में रुचि बढ़ने लगी। यह बात जिस अवस्था में आंदोलन छेड़ना पड़ा, उस अवस्था की तुलना में इसमें कोई संदेह नहीं कि जिन्होंने यह चालू रखने में प्रमुख हिस्सा लिया--कारागृह तथा उपनिवेश के उन उत्साही बंदीवान प्रचारकों के लिए भूषणास्पद, गौरवास्पद थी।
परंतु उस आंदोलन का संपूर्ण फल हाथ लगने के लिए वहाँ के शिक्षा विभाग द्वारा ही हिंदी नागरी का प्रचार होना आवश्यक था | उसका सूतोवाच हमने करवाया था। आगे दखेंगे--इसका क्या हुआ।

- वीर सावरकर 

(स्रोत: प्रस्तुत लेख वीर सावरकर की पुस्तक "मेरा आजीवन कारावास" से है।)

Wednesday, April 1, 2026

अनकहे किस्से



मौत के मुहाने पर खड़े होकर 
वो कहते हैं हमसे मिलेंगे 
हम कम्बख़त आखिरी बार भी मिल न पाए
कैसे हैं आप ये हाल चाल भी न ले पाए
तड़पकर रह जाता है मन
मिल न पाए उनके करीब होकर...
हमारे सामने चिता पर जलता रहा उनका तन 
आत्मा अमर है,क्या अगले जन्म होगा पुनः मिलन? 
विस्मृत विस्तृत कोरे कागजों पर लिख दिया 
क्या फर्क पड़ता है हमने अपने जीवन में क्या किया
लोग जान जाए मेरे अनकहे किस्से 
मरने के बाद अब गिला शिकवा किससे 
मालूम होनी चाहिए मेरी हकीक़त 
ईमानदारी और सत्य है मेरी वसीयत।।

Thursday, February 26, 2026

जितना गिरोगे उतना ही कटोगे

लोकतंत्र की आवाज को देखो बोलता है जोर से "आवाज दो हम एक हैं"... अनेकता में एकता तो भी सामाजिक समरसता की भावना उड़ेलते हुए
विचारधारा से समझौता कर फिर कहते हैं कुछ लोग की हम अपनी बातों पर अटल हैं..
खोखली पीलपीली लिजलिजाती हुई राजनीति कहा लेकर जाएगी... भविष्य अंधकारमय है वर्तमान में सब अंधे हैं अंधों को क्या फर्क पड़ता है अंधेरा है या रोशनी! 
युवा वर्ग की विवेचना साड़ी साया ब्लाउज स्कर्ट आदि तमाम तरह के वस्त्रों से ऊपर उठ ही नहीं सका है.. इसी को कहते हैं कि ये "नारीवादी" विचारधारा है। विचारधारा में "धारा" कही और ही बहती है... बेजान पड़ जाती है तो संविधान बचाने निकलती है। तख्ती पर लिखा जाता है "ब्राह्मणवाद से आजादी" दिल्ली में विस्फोट करते मौलाना जिहादी। कमीनापन और कठमुल्लापन में ज्यादा अंतर नहीं बस एक का रंग लाल और एक का रंग हरा है।
समाजवाद की पराकाष्ठा देखो "रोटी बेटी" संबंधों पर आ पड़ी है वो कहते हैं एकता और समता के लिए चुप रहो अखंडता की बात करो... वाह मां बहनों की इज्जत से इनकी राजनीति बड़ी है। मोपला से लेकर अबतक कितना गिरोगे? जितना गिरोगे उतना ही कटोगे... दबाए कुचले जाओगे। वोट के लिए क्या अपनी मां को भरे बाजार में बिकवाओगे? अस्तित्व की बात जब आती है तो अच्छी-अच्छी सत्ताएं उखड़ जाती है। "ये देश युद्ध का नहीं बुद्ध का है" बोलने से नहीं हो जाता है...यहां वीरता धैर्यता सुदर्शन चक्र से मापा जाता है।
अकर्मण्य और रीढ़हीन लोग किसी के काम के नहीं होते हैं। किसी ने कहा है "वीर भोग्य वसुंधरा" तो सत्य ही कहा है। कायरों के लिए विश्व में कोई स्थान नहीं है।

पशु चिकित्सक डीएनए एक्सपर्ट का क्या ही कहना। ये और इनका संगठन आजकल कुछ भी करते हैं वो आम लोगों के समझ से बाहर ही रहता हैं। इनके लिए सबका डीएनए एक है सबकी रगो में एक ही खून दौड़ रहा है।चलो माना कि "जो नीचे गिरे हैं, उन्हें झुककर उठाना होगा" पर इतना भी क्या झुकना  की कोई मारने लग जाए पीछे से। किसी भी कानून में मास्टरस्ट्रोक खोजने वाले को ये पता होना चाहिए "ठंडी चाय" के लिए चायवाला गाली ही सुनेगा। लोग कीमत चुकाते हैं एक अच्छी चाय के लिए इसपर भी कोई बांसी ठंडी चाय का समर्थन करे कि स्वास्थ्य के लिए बढ़िया होता है तो वो भी गरियाए जाने का उतना ही पात्र होगा जितना कि वो चाय वाला।




Saturday, August 16, 2025

जिन्ना, वोट चोरी के आरोप और भारत का विभाजन

1937 के बाद जिन्ना को विश्वास हो चला था उसका उस समय की कांग्रेस के रहते सत्ता के शीर्ष पर पहुंचना मुश्किल है, उसकी महत्वकांक्षाएं पूरी नहीं हो सकती है, इसलिए बिना पाकिस्तान बनाए उसका Ego संतुष्ट होगा नहीं। और सत्ता के लिए जिन्ना ने पाकिस्तान बनाने की कवायद और तेज कर दी। अब होते हैं 1945-46 के केंद्रीय चुनाव, यहां भी कांग्रेस को ज्यादातर राज्यों में बहुत प्राप्त होता है और कांग्रेस को 102 व मुस्लिम लीग को 30 सीटें मिलती है।

अब चूंकि 30 सीटों के साथ मुस्लिम लीग पार्टी और जिन्ना का सत्ता में आने का सपना पूरा नहीं होता सकता था इसलिए उन्होंने उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत, बिहार व बंगाल में तथाकथित रूप से उस समय कि कांग्रेस पर प्रशासन की मदद से "मतदाता सूची में बदलाव, सरकारी अफसरों के पक्षपात और तथाकथित रूप से वोट चोरी" के आरोप लगाए। लीन ने समुदाय विशेष से कहां कि 'आपका वोट अभी सुरक्षित नहीं है तो आगे क्या होगा' और अविश्वास की खाई को और गहरा कर दिया।

जिन्ना ने 17 जनवरी 1946 को भाषण दिया और "Glancy-Khizar Axis" (सरकार व उस समय के प्रशासन/संवैधानिक संस्थाओं जैसा कुछ का गठजोड़) की निंदा की, प्रशासन द्वारा लीग की चुनावी गतिविधियों में अवैध हस्तक्षेप का आरोप लगाया और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाया।

इन्हीं सब घटनाओं ने आगे चलकर "डायरेक्ट एक्शन डे" जिसमें हजारों भारतीय मारे गए व गृहयुद्ध जैसी कंडिशन बन गई के होने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, पाकिस्तान की मांग को और तेज कर दिया व अंततः भारत का विभाजन होकर पाकिस्तान बना और जिन्ना के सांप्रदायिक ईगो को संतुष्टि मिली।

खैर, वो समय दूसरा था ये समय दूसरा हैं। किरदारों व दलों के नाम बदल चुके हैं, लेकिन भावनाएं अभी भी वो ही है। लेकिन बढ़िया बात ये है कि अब हमारे पास इतिहास से मिले सबक है इसलिए हमें "इतिहास को स्वयं को दोहराने" से रोकना होगा। हां, मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं। किसी egoistic व सत्ता को अपनी वंशानुगत जागीर समझाने वाले के लिए फिर से भारत को खंडित नहीं होने दिया जा सकता है।
Peace 🕊️ 

~पुष्पराज आर्या 

Sunday, August 3, 2025

वोट के लिए बीवी और देश बेचते नेता

ईश्वर देख रहा है चारों तरफ अंधकार फैला हुआ है।
देश में वोट के लिए देश बेचते तो बहुत से नेता देखे लेकिन बीवी का सौदा करने वाला नेता पहली बार देखा है। नेता अपनी मां और बीवी को गल्ले पर बैठा देते हैं वोट पाने के लिए। कोई मौलवी नंगी बोलता है तो कोई मुस्लिम नेता अंतःवस्त देखता है पर नपुसंक नेता प्रेम और सौहार्द देखेगा। वाह नेताजी वाह क्या सोच है आपकी .. अपनी अर्द्धांगिनी को परोसने में नहीं हिचकेंगे ये कल को।
इस्लामिक आतंकवादी पतलून खोलकर गोली मारते हैं क्योंकि हिंदुओं का निजी अंग भंग नहीं होता अर्थात कटा नहीं होता है मुस्लिमों की तरह। कुछ लोग इस बात को छिपाकर आसानी से बकते हैं कि भारतीय देखकर गोली मारा..!
फिल्मी अभिनेता अभिनय करते हुए उंगलियों को पत्थर से कूचकर कहता है "देख ये तेरा खून ये मेरा खून अब बोल कौन सा खून मुस्लिम का है कौन सा हिंदू का है"
 अबे मियां मारने वाला पैंट खोलता है निजी अंग पर कटा निशान देखता है । बकवास करना बंद करो खून को लेकर.. सभी का खून शामिल है इस मिट्टी में बोलने वालों ये हिंदुओं के बाप दादा पूर्वजों का हिन्दुस्थान है.. तुम भारत माता की जय नहीं बोल सकते छाती में दांत गड़ाए बैठें हो वो अलग।
"इनका हिसाब चुकाते चुकाते हम खाक हो  जाएंगे" ब्रिगेडियर प्रताप के शब्दों में कुछ तो दम है। पर वातानुकूलित कमरे में बैठकर नीतियां निर्धारित करने वालों को इससे क्या लेना देना है।
 किसी को फर्क नहीं पड़ता है कौन मरता है। हजारो लोगों का नरसंहार हो चुका है पैंट खोलकर फ़िर ये कहते हैं सब भारतीय थे.. अरे चुप रहो ऐसी बकवासे सुनकर कान से खून निकलने लग जाता है। खून से याद आया इन लोगो का खून ही है न कि पानी बहता है रगो में?
बंद करो शांति और अमन की आशा वाली भाषा। भेड़िया को गाजर खिलाने से वो शाकाहारी नहीं हो जाता है वो मारकर खरगोश ही खाएगा। उसकी प्रवृत्ति ऐसी है वो खून ही पियेगा।
 कोई ये कह रहा था कि दादी से नाक मिलती है तो कटर हिन्दू शेरनी है । वो भारत को एक हिन्दू राष्ट्र समझती है इसलिए उन्होंने मारे गए लोगों को हिन्दू ना बताकर केवल भारतीय बताया, इनके लिए हिन्दू और भारतीय पर्यायवाची है। जो कि हमारे लिए भी होने चाहिए, सभी भारतीय हिन्दू ही है। सबका DNA हिन्दू है। इनकी इस वैज्ञानिक सोच व दार्शनिकता के लिए उनको मेरे वार्ड का पाषर्द बनाया जाना चाहिए।
बस भैया ये बताओ पैंट खोलकर कैसे पता चलेगा कि आप भारतीय हो?
... वो भारतीय भारतीय कर रही है अपने को बुद्धिजीवी दिखाने के लिए उसकी जिस दादी से नाक मिलती है उसी दादी के राज में उसी नाक के नीचे से खालिस्तानियों ने धर्म पूछकर बस से उतारकर और छात्रवासो में घुसकर गोली मारी थी हिंदुओं को।
बात यहां तक नहीं बढ़ती पर सत्ता का नशा है वो उतरा नहीं तभी मंदबुद्धि कहता है कि मेरे दादी के सामने चायवाला 50 पर्सेंट भी नहीं.. इनके चाटुकार खुलेआम कहते हैं कि लाल चौक पर जाने में फटती थी.! चाय वाले में जिगरा था लाल चौक पर झंडा गाड़ आया जहां तेरे चाटुकारो की फटती थी जाने में।

सदन चले या न चले पर सैनिक का ऑपरेशन नहीं रुकता है । सदन चलने में लाखों करोड़ों रुपया बहता है पानी की तरह पर ऑपरेशन में सैनिक का खून बहता है।
ऑपरेशन नहीं रुकता अंजाम तक पहुंचने तक। सदन स्थगित हो जाता है बिना कोई चर्चा के महीनों तक और दो कौड़ी का नेता कहता है कि ऑपरेशन कल ही क्यों हुआ?
 कश्मीर का ऑपरेशन है रामपुर का भैंसा खोजों अभियान नहीं। गिड़गिड़ाते रहो।
चीन बड़ा दुश्मन है अपने बाप की तरह दोहराते रहो। 

नहीं मतलब कि थोड़ी भी शर्म है तो गटर के चुल्लू भर पानी में डूबे मरो।

सब साबित करने में लगे हैं कि "हमारे वाले नेता (महिला-पुरूष सभी) ने सामने वाले को पेल दिया, हमारे नेता ने महफील लूट ली।" उधर संसद में खुद तथाकथित विपक्षी जननेता व सरकारी विश्वगुरु के नेतृत्व में उनके सांसद खुद मनोरंजन का माहौल बनाकर बैठे थे।

Tuesday, July 29, 2025

बाबर के संतानों के नाम संदेश

बाबर को भारत पर हमला करने का न्यौता दौलत खान लोदी ने दिया था ये पत्थर पर लिखा इतिहास है किसी दो कौड़ी के नेता की जुबान नहीं जो पल-पल में  बदल जाए। यही शाश्वत सत्य है और ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है।  बाबरनामा का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे वहां कहीं नहीं लिखा है कि संग्राम सिंह "राणा सांगा" ने बाबर को न्योता दिया था। इनसे बड़ा योद्धा तो सिर्फ काल भोज "बप्पा रावल" और राणा कुंभ ही हुए हैं।

बाबरनामा पर ध्यान दिया जाए तो सबसे पहली बात जो ध्यान देने योग्य है वह यह है कि बाबर द्वारा लिखी गयी हस्तलिखित पोथी किसी के पास उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी बात बाबर की लिखी दैनंदिनी का उसने कुछ नाम रखा भी था या नहीं इस विषय में भी इतिहासकारों में संशय है। जो पोथियाँ मिली हैं और जिनके आधार पर बाबरनामा तैयार हुई हैं, अधिकतर अकबर के समय लिखी गयीं हैं। बाबर ने जो अपनी पोथी की नकल अपने मित्र को दी थी, उसका भी कुछ अता पता नहीं है। जब बाबरनामा ही सवालों के घेरे में हैं, तब उसमें लिखीं बातों पर इतने जोश में सपा नेता संसद में किस आधार पर चिल्ला रहा था?

बाबरनामा में क्या लिखा है? जिस पर बवाल है। इब्राहीम लोदी को हराने के बाद बाबर अपनी दैनंदिनी में लिखता है कि जब हम लोग काबुल में थे, तो राणा सांगा के दूत ने उपस्थित होकर उसकी ओर से निष्ठा प्रदर्शित की थी, और यह निश्चय किया था कि बाबर उस ओर से देहली के समीप पहुँच जाए तो मैं इस ओर से आगरा पर आक्रमण कर दूंगा। मैंने इब्राहीम को पराजित भी कर दिया, देहली तथा आगरा पर अधिकार भी जमा लिया किन्तु इस काफिर के किसी ओर हिलने के चिह्न दृष्टिगत न हुए।


यहाँ बाबर किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में है, वह समझ नहीं पा रहा कि जो दूत आया था वह राणा सांगा ने ही भेजा था या किसी और ने, क्योंकि दूत द्वारा जो रणनीति बतायी गयी थी; वैसा कुछ होता उसे दिखा नहीं।

 बाबर नामा में बाबर सांगा और राजपूतो की बहादुरी और युद्ध कौशल की भूरी भूरी प्रसंशा करता हैं।
एक प्रसंग में जब बाबर राजपूतो की बड़ाई करता है तो उसका एक सेनापति बोलता है कि हारने वाले वालो की प्रसंशा क्यों करना ?
बाबर कहता है कि फरगना में मैं भी हारा तो क्या मैं साहसी नहीं हूँ।
इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा की पुस्तक  "उदयपुर राज्य का इतिहास" में लिखा है कि  पंजाब के हाकिम दौलतखां लोदी ने विक्रम संवत १५८२ में इब्राहिम लोदी से विद्रोह कर बाबर को हिंदुस्तान में बुलाया।
आगे लिखा है - बाबर अपनी दिनचर्या में लिखता है कि राणा सांगा ने भी पहले मेरे पास दूत भेजकर मुझे भारत में बुलाया और कहलाया था कि आप दिल्ली तक का इलाक़ा ले लें और मैं आगरे तक ले लूँ।
स्त्रोत: उदयपुर राज्य का इतिहास

एक और बात लिखा हुआ है कि इब्राहिम लोदी का शासन कमज़ोर हो चला था और भारत का असल सम्राट राणा सांगा ही था, और भारत में मेरा (बाबर का )  असली मुक़ाबला राणा सांगा से ही होना था।
जब इब्राहिम लोदी का शासन कमज़ोर था तो राणा सांगा उससे लड़ने किसी बाहरी को क्यों बुलायेंगे।
बाबर यह अच्छी तरह जानता था कि हिन्दुस्तान में उसका सबसे भयंकर शत्रु महाराणा सांगा था, इब्राहीम लोदी नहीं। यदि बाबर न आंता तो भी इब्राहीम लोदी तो नष्ट हो जाता। महाराणा की बढ़ती हुई शक्ति और प्रतिष्ठा को वह जानता था। उसे यह भी निश्चय था कि महाराणा से युद्ध करने के दो ही परिणाम हो सकते हैं-या तो
वह भारत का सम्राद हो जाय, या उसकी सब आशाओं पर पानी फिर जाय और उसे वापस काबुल जाना पड़े।

राणा सांगा और बाबर का आमना सामना
ओझा जी अपनी पुस्तक में विवरण देते हैं कि  बाबर बहुत उदास हो गया था और बेचैनी डूबा हुआ था उसने प्रतिज्ञा लिया कि शराब को कभी हाथ नहीं लगाएगा।
 "सरदारो और सिपाहियो ! प्रत्येक मनुष्य, जो संसार में आता है, अवश्य मरता है; जब हम चले जायंगे तब एक ईश्वर ही बाकी रहेगा, जो कोई जीवन का भोग करने बैठेगा उसको अवश्य भरना भी होगा, जो इस संसाररूपी सराय में आता है उसे एक दिन यहां से विदा भी होना पड़ता है, इसलिये बदनाम होकर जीने की अपेक्षा प्रतिष्ठा के साथ मरना अच्छा है। मैं भी यही चाहता हूं कि कीर्ति के साथ मेरी मृत्यु हो तो अच्छा होगा, शरीर तो नाशवान् है। परमात्मा ने हमपर बड़ी कृपा की है कि इस लड़ाई में हम मरेंगे तो शहीद होंगे और जीतेंगे तो ग़ाज़ी कहलावेंगे, इसलिये सबको कुरान हाथ में लेकर क्रसम खानी चाहिये कि प्राण रहते कोई भी युद्ध में पीठ दिखाने का विचार न करे"।

सब समय का फेर है ना कभी भारत अविजीत रह सकता था ना उसे जीतने वाले अरब फारसी या तुर्क।
जो तुर्क महान साम्राज्य बना वो यूरोप का मरीज भी बना। जो इस्लामी साम्राज्य अपने पर नाज करता था उसे चंगेज ने अपने घोड़े के टापों तले रौंद दिया।
जिस मुग़ल राजा अकबर की गिनती अब तक के सबसे अमीर 5 लोगो में होती हैं उसी के वंश के औरतो ने बर्तन बेच कर एक टाइम का खाना खाया है। और बाद में तो भूख से बेहाल होकर सडक पर दौड़ लगा दी थी। दुनिया का पहला साम्राज्य इजिप्ट और ग्रीस आज कहाँ हैं देख लो।
कुछ तथाकथित युवा कार्यकर्ता लोग अपने नेता के घटिया बयान के समर्थन में आकर लूसेंट के सामान्य ज्ञान पुस्तक का हवाला दे रहे थे। समझ में आता है इनका बौद्धिक स्तर किस स्तर का है। जिस लोदी को लेकर सपा नेता ने नाम लिया उसके वंश का इतिहास देख लेना चाहिए हिंदुओं के खून से रंगा मिलेगा।

जिस  नेता ने महाराणा सांगा पर विवादित टिप्पणी की है, उन्हें जाकर स्कूल में पढ़ना लिखना चाहिए। पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती, किसी भी उम्र में पढ़ाई आरंभ की जा सकती है। पढ़ाई करो और ज्ञान पाओ, ताकि बाद में ये न कह सको कि लोकतंत्र ने भी हमें पढ़ने नहीं दिया।

Sunday, June 29, 2025

पक्षियों के साथ सुकून मिलता है

 गर्मी का मौसम है.. हद से ज्यादा ही पड़ रही है इस साल। लोगो का कहना है मई तो गई जून तो लगता है भून कर ही दम लेगा। पर्यावरण में बदलाव तो देखने को मिला ही है कुछ सालों में । इसमें कोई दो राय नहीं है। लाखों पेड़ कटे हैं चौड़ी सड़के बनाने के लिए। कुछ तो असर पड़ना ही था इसका।  हमारा तो फिर भी सही है हम लोग सक्षम हैं पर पशु पक्षियों की तो हालत खराब हो जाती हैं। खासकर उन पक्षियों की जो पास के तालाब और पेड़ों पर निर्भर रहते हैं। दाना पानी का छत या घर के आंगन में रख देना चाहिए तरह तरह के पक्षी आते जाते रहते हैं। मै भी यही करता हूं। अच्छा लगता है इनका पक्षियों का आना जाना चहचहाना।
ये बहुत व्याकुल थी जब इसकी नजर इस जल पात्र पड़ी तो इसने बहुत राहत महसूस किया और इधर उधर चहकने लगी।

सबसे खास बात ये कि ये समय से आती है इसका समय तय रहता है । एक दम सुबह में यही दिखती है।
ये बहुत ही चतुर और चालाक चिड़िया है। इसकी गतिविधियों पर नजर रखने में बहुत आनंद मिलता है।


लंबी पूछ वाला  पक्षी

अंग्रेजी में इसे Rufous treepie कहते हैं। कोटरी" या "टका चोर" भी कहा जाता है। इसे "हांडी चंचा" भी कहा जाता है। इस चिड़िया के बारे में कहा जाता है कि वह बाघ के मुंह में घुस के दांतों में फंसे मांस को निकाल 
कर भोजन करती है । 
ये सच में बहुत चालाक पक्षी है। आता है तो चारों झांकता ताकता है और फिर पानी पीकर उड़ जाता है। 
एक दिन देखा पंखे पर बैठा हुआ है चोंच से कुछ दबाया हुआ था ।

फिर उड़कर छज्जे से निकले पिलर पर जाकर बैठ गया । साफ- साफ दिख रहा है इसके मुह में कुछ है। 
फिर अचानक से कुछ नीचे गिरा था । पता नहीं चला था जब फुर्र हो गया तब देखा। एक फूटा अंडा था। 
फिर आया घर की चारदीवारी पर बैठ गया।
इसकी आवाज मैने बिल्कुल भी नहीं सुनी । बड़ा ही शान्त नजर आय ये। बड़ा  ही सुंदर पक्षी।  
ये एक अद्भुत पल था मेरे लिए इस तरह से इसे देखना। ऐसा दृश्य जिसे अपने मोबाइल कैमरे में कैद में कर लिया। ये पक्षी मुझे। फिर शाम को छत पर भी दिखा। 
भुअरी चिड़िया

भरी दोपहरीया में इनका जमावड़ा जरूर लगा रहा है कोई पक्षी आए या नहीं ये सब चहचहाते हुए दिखेंगे।
देखिए कैसे छज्जे से निकले छड़ पर बैठी हुई है ये चिड़िया।
बरामदे में लगा पानी का नल खोल देता हु कुछ देर तक तो पानी लग जाता है और छपाक छपाक करने में बहुत आनंद आता है। गर्मियों से इन्हें राहत मिलता है। 
पानी में बैठकर जब ये अपना पंख फड़फड़ाती हैं तो देखते बनता हैं। इन पक्षियों के अजीब सा सुकून मिलता है जो और दुनिया के किसी भी कोने या हिस्से में नहीं 

घर के चार दिवारी पर इक्कठे बैठती हैं तो लगता है घर की सुरक्षा इनके जिम्में हैं कोई आ नहीं सकता बाहर इनके इजाजत के।
इस दीवार पर बैठकर इनकी चहचहाहट खूब तेज हो जाती है। इनकी नजरे बहुत तेज होती है भोजन की तलाश में। कुछ न कुछ ये ताकते झांकते ही रहते हैं।

बगल वाले घर में एक छोटा सा आम का और अमरूद का पेड़ लगा हुआ है इनके पकते ही फोड़ फोड़कर इनका खाना शुरू हो जाता है।
एक दम भोर में जब मैं किताबें खोलकर पढ़ रहा होता हूं तो तब एक दो पक्षी हमेशा आते हैं खिड़की पर खुट खुट करने ताकि मैं नींद में न हो जाऊं।

उफ्फ तुम्हारा यू आकर पास बैठ जाना... सुबह सुबह खिड़की पर एक खट खट की आवाज आती है मानो आज तो कांच फूट ही जाएगा .... चोंच की ठोकरों से इतनी तेज आवाज आती है लगातार पढ़ने का लय टूट जाता है छोटा सा विश्राम मिल जाता है ... राहत और सुकून महसूस होता है जीवन में बहुत है करने को देखने को....तुम उड़कर दुनिया देखती हो मैं भी एक दिन उडूंगा फर्क इतना होगा की तुम्हारे पंखों की उड़ान है मेरी हौसलों की उड़ान।

कुछ पक्षियों आना जाना ही लगभग फोटो खिंचवाने के लिए होता है।
डव 🕊️ सिर्फ छत पर दिखते हैं सबसे अधिक तब जब छत गेहूं सूखने के लिए रखा हो। 
ये पक्षी हमेशा जोड़े में दिखेंगे या जब भी आएंगे एक साथ कई दिखेंगे।


छोटकी चिरइया 🐦‍⬛ 
इनका भी क्या ही कहना ये तो बिजली के तार खंभे हर जगह बैठकर चाय चाय चहचहाती हैं।
इनका अपना अलग ही समूह रहता है इक्कठे ये आती हैं इक्कठे जाती हैं।
इनका अपना अलग ही संसार है। खुले आसमान में कही भी उड़ चले और ऊंचाई पर बैठे गए।
सुबह शाम पक्षियों को आना जाना लगा रहता है। अब बारिश का मौसम शुरू हो चुका है तो थोड़ा कम ही आना जाना लगा रहता है। 

उड़ता हुआ आसमान में अब सूरज भी डूबने को है। सब धीरे धीरे अपने ठिकाने पर ऐसे ही निकलते हैं। शानदार नजारा देखने को मिलता है। 
देखा जाए तो सारा संसार इन पक्षियों का है। जहां मन किया तब घूम आएं। मौसम को देखते हुए तमाम देश विदेश के पक्षियों का आना जाना लगा ही रहता है। इन्हें किसी भी तरह के नियमों/बंदिशों का सामना नहीं करना पड़ता है। पंखों की उड़ान ही काफी है इस दुनिया जहां को के लिए।
इन पक्षियों पर अनेक कविताएं कहानियां लिखने वाले लिखकर चले गए हैं। इसी तरह मैने एक नए लेखक की पुस्तक पढ़ी थी "बनकिसा"  ये बनकिस्सा- स्टोरीज ऑफ किंगफिशर वाकई में पढ़ने लायक पुस्तक है। पुस्तक के लेखक  सुनील कुमार "सिंक्रेटिक" बढ़िया लगा पढ़कर कुछ नया था इसमें..किंगफिशर "मच्छराजा" किस्से सुनाता है अपने मित्र जलकाक और कछुआ को..।


जब हम लोग छोटे थे बचपन में दुर्दशन पर एक कार्यक्रम आता था "जंगल टेल्स" बिल्कुल इसी तरह से कुछ लगा इनका पुस्तक। पढ़ने को तो सबने "चंपक" भी पढ़ा है । पर नए लेखकों में इनका कार्य सराहनीय है।
जीवन में बहुत सारे किस्से मिलेंगे सुनने को पक्षियों के किस्से कमाल के होते हैं। अगर पक्षी इंसानों की तरह बोल पाते तो दुनिया अनगिनत रहस्यों का पता चल जाता। और भी बहुत कुछ होता । कुछ पक्षियों को तो हम सुनते और देखते ही हैं हमारी बोली का नकल उतारते हुए।
उत्तर दक्षिण हर तरफ इनकी नजरे होती हैं। एक दम समझदारी से भरी हुईं। कुटिलता तो कूट कूट कर भरी हुई है इनमें। इनकी नजरे वो देखती हैं जो कोई देख पाता होगा।
एक दम से सावधान मुद्रा में। इनका हाव भाव बहुत कुछ कहता है। समय के साथ इनकी समझ कई गुना बढ़ी ही है। इसे नकारा नहीं जा सकता है।  पक्षियों से बहुत कुछ सिखा जाता सकता है। जैसे समय के साथ चलना और विभिन्न स्थानों के अनुसार खुद को ढालना । वहीं बसेरा हो जहां खर्चा पानी निकल सके। जीवन जबतक है तब तक मस्त चलता रहे । तनाव मुक्त रहना है तो इन पक्षियों को देखिए और समझिए। इनका जीवन कठिन ही है।
ये जब मैं गांव में था तब खींचा था लगभग 5_6 साल हो गए होंगे।
पक्षियों से सीखिए मेहनत करना और रुकना नहीं है तिनका तिनका बीन बटोर कर घोंसला बनाना आसान नहीं है अगर आंधियों में वो पेड़ टूटकर गिर जाए तो। अस्तित्व में रहने के लिए जो बन जाए वो करना चाहिए। आसान नहीं है इनके लिए भी शिकारियों और सांपों से खुद और अंडों को बचाना।  एक बात याद रखिए इन पक्षियों को आजाद रहने दीजिए पालने से बचिए। पिंजरे में कैद कोई नहीं रहना चाहेगा। इनका जब मन करेगा आती जाती रहेंगी। ये पूरे विश्व का भ्रमण करती हैं आप भी करिए अपने पहचान को जिंदा रखते हुए।