सन् १९०६ से हम हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में सम्मान दिलाने तथा यथासंभव उपायों से उसका प्रचार करने के लिए सशत प्रयत्नरत थे। जब हम इंग्लैंड में थे तब ' अभिनव भारत' के सदस्य हर रात सोने से पहले संगठित रूप में तथा एक स्वर में अपना जो राष्ट्रीय संकल्प का पाठ करते, उसमें “हिंदुस्थान को स्वतंत्र करना, हिंदुस्थान को एक राष्ट्र करना, हिंदुस्थान में प्रजातंत्र को स्थापना करना '-इन सूत्रों के साथ ही चौथा सूत्र घोषित किया जाता-हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना, नागरी को राष्ट्रलिपि बनाना |
इस नीति के अनुसार संगठन और प्रचार करने के लिए जो भी थोड़ा अवसर प्राप्त होता, उसमें हमने सन् १९११ में ही जो कार्यक्रम मन में पक्का किया, हिंदी प्रचार उसमें एक मुख्य विषय था।
उस समय यह धारणा इतनी संकुचित थी कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाया जाए, इस कल्पना को बड़े-बड़े नेता भी बचपने की बात समझते थे। साधारण लोगों के लिए तो वह अपरिचित ही थी। आगे चलकर इस आंदोलन को इतना महत्त्व प्राप्त हो गया कि लोकमान्य तिलक या महात्मा गांधी द्वारा उसका प्रत्यक्ष समर्थन करने की स्थिति भी बाद में ही आई। उस समय केवल नागरी प्रचारिणी सभा और आर्यसमाज के चंद लोग ही विशेषतः इस आंदोलन के समर्थक थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वामी दयानंद सरस्वती को यह घोषित करने का ही नहीं कि हिंदी राष्ट्रभाषा हे, अपितु उसमें ग्रंथ लेखन का भी प्रथम सम्मान प्राप्त है ।
ऐसी अवस्था में जब हम सन् १९११ से सभी भारतीय राजबंदियो तथा साधारण बंदियों से हिंदी सीखने का अनुरोध करने लगे, तब इस तथ्य से ही विवाद करना पड़ता कि हिंदी भाषा है भी या नहीं ? महाराष्ट्र तथा अन्य दक्षिण के लोगों को हिंदी भाषा शब्द भी नया सा प्रतीत होता। वे उस भाषा को मुसलमानी भाषा कहा करते थे, क्योंकि दक्षिणी मुसलमानों की वही मातृभाषा कम-से-कम समाज भाषा होती है। उत्तर के बंदी जानते थे कि यह हिंदुओं की ही भाषा है और आठ करोड़ हिंदु-मुसलमान आज भी मातृभाषा के रूप में उसका प्रयोग करते हैं । परंतु फिर भी वह राष्ट्रभाषा कहलाने योग्य नहीं है, ऐसा वे कहते थे । कोई कहता, इसमें व्याकरण नहीं; कोई कहता, इसमें साहित्य नहीं | मद्रासी आदि लोगों का हिंदी को राष्ट्रभाषा न मानना स्वाभाविक था, परंतु विरोध बंगाली युवकों में ही अधिक दृग्गोचर होता था, क्योंकि उनमें स्वाभाविक महत्त्वाकांक्षा थी कि बँगला राष्ट्रभाषा हो । वास्तव में देखा जाय तो हिंदी के बाद संख्याबल की दृष्टि से बँगला ही राष्ट्रभाषा होने की अधिकारिणी है, क्योंकि चार करोड़ लोग बँगला बोलते हैं और मराठी की तरह ही साहित्य के क्षेत्र में भी वह हिंदुस्थानी भाषाओं में अग्रणी है। तथापि बंगाल के ही एक नेता श्री मित्र ने बहुत पहले ही इस बात को स्वीकार किया था कि हिंदी में राष्ट्रभाषा होने को योग्यता अधिक है। इतना ही नहीं अपितु हिंदी का समर्थन करने के लिए उन्होंने एक पत्रिका भी निकाली थी।
इन सभी आक्षेपों का बार-बार निराकरण करके मैं नाना तर्को द्वारा सभी के गले यह उतारने का प्रयास करता कि साहित्य, व्याकरण, प्रौढ़ता, भवितव्यता तथा क्षमता, इन गुणों से संख्याबल सदृश ही हिंदी राष्ट्रभाषा होने के योग्य है । इतना ही नहीं, इससे पूर्व ही अपरिहार्य रूप से वह राष्ट्रभाषा बन भी चुकी है। इसके लिए हिंदी के उत्तमोत्तम श्रेष्ठ प्राचीन ग्रंथ मँगवाए। यह सही है कि हिंदी में नवीन साहित्य नहीं है, परंतु अब उसका इतनी तेज गति से निर्माण हो रहा है कि यदि आप सभी यत्न करेंगे तो हिंदी साहित्य इतना श्रेष्ठ होगा कि पाँच-एक वर्षों में वह संपूर्ण विश्व में भी महत्त्वपूर्ण हो जाएगा। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना नहीं है, वह तो राष्ट्रभाषा है ही रामेश्वर का वैरागी और व्यापारी यही भाषा बोलते हुए हरिद्वार में पृथ्वीराज के साम्राज्य से भी पूर्व काल से आता-जाता रहा है। इस तरह के अनेक तको के साथ हम राजबंदियों को जिस तरह हिंदी सीखने के लिए प्रवृत्त करते, उसी तरह अन्य बंदियों को भी करते।
हमारा शिक्षा-क्रम ही इस तरह का था कि हर राजबंदी अन्य प्रांतीय भाषाओं का यथासंभव अध्ययन करे। अंदमान में ऐसे ज्ञानार्जन का अवसर उत्तम था। उसी तरह हम स्वयं बंगालियों को हिंदी-मराठी, मराठों को हिंदी और बँगला, पंजाबियों को उनकी और पंजाब की तरफ की गुरुमुखी आदि भाषाएँ पढ़ाते। आखिरी दम तक यह उद्योग चल रहा था। गुजराती राजबंदी सबसे अंत में आए। परंतु उन्हें भी देवनागरी लिपि और भाषाएँ पढ़ाकर उस अवधि में हमने उन्हें इतनी शिक्षा दी कि वे हिंदी पुस्तक पढ़ सकें। अन्य बंदियों को तो प्रथमतः हिंदी भाषा सिखाई जाती और उसके पश्चात् अन्य। इस प्रकार दस वर्षो से हमारे और हमारे साथियों का निरंतर कार्य चल रहा था।
पीछे लिखा ही है कि इसके लिए हमने उत्तम हिंदी ग्रंथालय बनाना असंभव होने के कारण किस प्रकार चलता-फिरता ग्रंथालय बना रखा था। इस ग्रंथालय के लिए हमने धन जुटाने के विभिन्न रास्ते अपनाए थे। हमारी सहायता करने के लिए बाहर के कई स्वतंत्र अधिकारी कभी-कभी द्रव्य देना चाहते थे। हम उनसे यह कहकर कि परस्पर हिंदी पुस्तकें माँगकर दे दीजिए, वे पुस्तकें ग्रंथालय को दे देते। अंदमान में पुस्तकें मँगवाना भी चोरी थी। अतः द्रव्य सहायता, पता देना और पते पर केवल पुस्तकें मँगवाना भी सहायता ही समझी जाती। यह साहस का काम था। क्योंकि यदि सरकार को ज्ञात होता कि इसने बंदी से संबंध रखा है तो उस स्वतंत्र अधिकारी को भी पदच्युत किया जा सकता था। फिर भी वे पते देते। इतना ही नहीं, हिंदुस्थान से आए स्वतंत्र अधिकारियों में भी हिंदी प्रचार करने का कार्य चूँकि हमारी संस्था करती थी, इसलिए हिंदी सीखने के लिए उन्हें भी हमारी आवश्यकता होती थी | कई मद्रासी सज्जन-अधिकारियों को हिंदी पढ़ाने के लिए हमारे सहायक बंदी अंतःस्थ रूप से जाते। एक राष्ट्राभिमानी डॉक्टर ने तो अपनी धर्मपत्नी को भी हिंदी सिखाकर उससे बेटे के सामने भी हिंदी में ही वार्तालाप करने का अभ्यास करवाया, ताकि उसका बेटा मातृभाषा की तरह ही हिंदी सीख ले। ये सज्जन कभीकभी हिंदी प्रचारार्थ पाँच-दस रुपए दान भी करते। इन स्वतंत्र अधिकारियों को सहायता के अतिरेक में हम और अनेक प्रसंग साध्य करते | उसको स्पष्ट करते हुए दो उदाहरण रख रहे हैं।
एक साधारण अल्पशिक्षित किसान, जिसका नाम दिवाण था और जो आर्यसमाज से पूर्व परिचित था, किसी डाकेजनी के झंझट में उलझकर आजन्म कारावास का कैदी बनकर आया था। उसकी हमपर बड़ी श्रद्धा थी। उसने हमारी संस्था में प्रचुर मात्रा में कार्य किया लोगों पर उसका दबदबा था, परंतु दुर्भाग्यवश वह ऐन युवावस्था में ही अंदमान की जलवायु तथा कष्टप्रद बंदीवास का शिकार बन गया | उसके इष्ट मित्रों ने उसके नाम पर कुछ भोज आदि का प्रबंध करने की योजना बनाई | हमने उन्हें समझा-बुझाकर उन पैसों से उसके नाम पर हिंदी ग्रंथ तथा क्रमिक रूप से पुस्तकें खरीदकर ग्रंथालय तथा निर्धन बंदियों को दान करने का निश्चय किया । एक व्यक्ति को, जिसका नाम बिहारी था, फाँसी का दंड हो गया। उसने कुछ द्रव्य दान की मनौती माँगी । संयोगवश वह दंड रदूद होने के कारण उसने पूछा-वह दान कैसे किया जाए। मेरे उपदेश से ये भोज-प्रसंग लगभग बंद ही हो गए थे। ग्रंथों के तथा ज्ञान प्रसारार्थ ज्ञान दान करने की योजना बनाएँ तो सिख, उर्दू, अंग्रेजी प्रत्येक वर्ग कहता-- वह दान अपनी भाषा की पुस्तकों को मिलना चाहिए। हमारे विरोध करने पर वे कहते राष्ट्रीय भाषा का चिकना-चुपड़ा ढोंग करके बँगला, पंजाबी आदि भाषाओं को खत्म करना चाहता है। परंतु हम कहते, मैं अपनी मराठी के लिए दान नहीं माँग रहा हूँ । यदि ऐसा हो तो आपका संदेह ठीक है, पर हिंदी के लिए दो। मैंने स्वयं गुरुमुखी सहित उन सारी प्रांतीय भाषाओं का अध्ययन किया था। अन्य लोगों को बँगला आदि स्वयं पढ़ाता भी था | क्या मुझे मराठी की-अपनी ही भाषा की हत्या करनी है ? परंतु राष्ट्रीय हित के सामने अपने प्रादेशिक अभिमान का बलिदान देना ही होगा। इस तरह उन्हें समझाते हुए अंत में उन पैसों से हिंदी पुस्तकें मँगवाने के लिए हमने उन बंदियों को तैयार किया और आल्हा-ऊदल सदृश लोकप्रिय किंतु प्राचीन शैली के ग्रंथों से लेकर नागरी प्रचारिणी की नवीनतम ग्रंथमाला तक सौ-एक रुपयों के ग्रंथ मँगवाए। हमें स्वयं भी आल्हा ग्रंथ अत्यधिक प्रिय था।
उस बंगाली स्नेही को, जो हिंदी को प्रौढ़ भाषा नहीं समझता था अथवा उसके अनुसार हिंदी में साहित्य नहीं था, यह दिखाने के लिए कि वह कितनी गमनशील है, हिंदी के गुरुकुल स्थित अथवा उत्तमोत्तम ग्रंथ प्रकाशित होते ही उन्हें मँगवाकर दिखाता। कभी-कभी उन्हें यह संतोषजनक प्रतीत न होता और उसमें अपमानजनक कम-से-कम किसी दुष्टतापूर्ण हेतु की गंध आती। परंतु उस हेतु प्रतिकूलता को भी सहते हुए मैं यह करता ही रहा। अंत में यह मान्यता कि हिंदी राष्ट्रभाषा है, इतनी सार्वजनिक हो गई कि वह सिद्ध करते रहने की स्थिति से सिद्धांत को स्थिति तक पहुँच गई | सिखों का मन हिंदी की ओर करने के लिए एक भिन्न युक्तिवाद तर्क उपयुक्त होता | उनमें से कई सरदार इस सत्य से अनभिज्ञ होते कि श्री गोविंद गुरु का ' विचित्र नाटक' आदि ग्रंथ और ' सूर्य प्रकाश' आदि इतिहास शुद्ध ब्रजभाषा में अर्थात् प्राचीन हिंदी में हैं। परंतु एक बार उन्हें यह समझाया कि किस प्रकार हिंदी उनको धर्मभाषा है और गुरुमुखी मात्र एक लिपि है, तो फिर उन्हं हिंदी का महत्त्व न केवल राष्ट्रीय दृष्टि से वरन् पंथ की दृष्टि से भी पूर्णतया मान्य हो गया।
कारागारीय ग्रंथों के अध्ययन से गुरुमुखी के संबंध में हमारा अभिप्राय इस प्रकार था कि परंपरा से प्रचलित यह मत कि इस लिपि को गुरु ने खोजा है, ऐतिहासिक नहीं है। उसका बस इतना ही अर्थ है कि उस समय पंजाब में प्रचलित लुंडी-मुंडी (मोड़ी) आदि व्यापारिक तथा सामान्य जनों की लिपियों में से गुरु द्वारा चुनी गई वह एक पुरानी लिपि थी। सिख धर्मग्रंथ ' शास्त्री ' (नागरी) में न लिखते हुए सांधारण लोगों में प्रचलित उस लिपि में लिखवाए गए जैसे गौतम बुद्ध ने पाली में । हो सकता है, इसीलिए उसे गुरुमुखी नामाभिधान प्राप्त हो गया। यह स्वतंत्र विषय है। बातों-बातों में विषय छिड़ गया था, इसीलिए उल्लेख किया है। हमें उस समय भी यह ज्ञात था कि आज तक किसी भी विद्वान् ने इस उपपत्ति का समर्थन नहीं किया था। उसकी यथार्थता अथवा अयथार्थता का दायित्व जब तक मुझे ज्ञात है, मेरा है। इस संबंध में अनेक ' ग्रंथों' और सिख इतिहास के विद्वानों से हम कई बार चर्चा भी करते थे।
प्रथमत: मैं मराठी भी किसीको पढ़ने नहीं देता। क्यों? प्रथम मातृभाषा, फिर तुरंत हिंदी और इसके पश्चात् अन्य प्रांतीय हिंदू भाषा--इस तरह क्रम रखा था। जहाँ तक हो सके प्रत्येक को अन्य प्रांतीय भाषा पढ़ने का अनुरोध करता, परंतु तमिल संघ की (मलयालम, तेलुगु, कन्नड, तमिल) द्रविड़ भाषाओं को पढ़ाने की सुविधा--उनके ग्रंथों का संग्रह और प्रचारक न होने से और मेरे लिए वह ग्रीक-लैटिन के बराबर होने से मैं प्रबंध नहीं कर सका | इसमें मैं हमेशा ही अपनी न्यूनता समझता। आज भी उस कमी को मैं पूरा नहीं कर पाया हूँ। शेष मराठी, पंजाबी, बँगला भाषाएँ प्राय: सभी राजबंदियों तथा शिक्षित बंदियों को अच्छी तरह से अवगत थीं। मराठी के महत्त्वपूर्ण विशेष ग्रंथ भी वे पढ़ते। तथापि मैं इसकी सूक्ष्म जानकारी नित्य ही प्राप्त करता कि द्रविड़ भाषा में कौन-कौन से नए ग्रंथ हैं; और आखिरी-आखिरी दिनों में पर्यवेक्षकों से उन भाषाओं की प्राथमिक पुस्तकें तथा अन्य नए ग्रंथ मँगवाने की अनुमति तथा पैसे लेकर एक टिप्पणी करके उन्हें मँगवाया भी, परंतु मेरी आकस्मिक वापसी के कारण मुझे कुछ भी पता नहीं चला कि आगे उसका क्या हुआ।
अंदमान में विभिन्न प्रांतीय लोगों के एकत्रित होने के बाद उनमें बोलचाल को भाषा अपने आप ही हिंदी होती है। उधर बंदियों की जो संतानें हैं, उनमें भी परस्पर प्रांतीय लोगों में ब्याह होने के कारण अंदमान में जन्मे बच्चों की मातृभाषा सहज ही हिंदी होती थी | इन ' स्वतंत्र' लोगों में बहुलांश में हिंदू लोग ही थे, इसलिए पाठशालाओं में प्रमुखतः हिंदी में ही शिक्षा देनी चाहिए थी। परंतु पूर्व काल से ही हिंदुस्थान के जो 'मुंशी' के रूप में वहाँ गए वे ata, दिल्ली आदि के उर्दूशिक्षितों में से होने के कारण अंदमान की प्राथमिक पाठशालाओं में उर्दू पढ़ाने की परिपाटी बन गई | इसका एक और अन्य कारण यह था कि कार्यालयों (Offices) में उर्दू नौकरों की ही भरमार होने के कारण वहाँ दफ्तर की दूसरी भाषा उर्दू ही हो गई थी ।
पहली पाठशाला से बाहर निकले उदू-शिक्षित छात्रों के उदाहरण से शिक्षित का अर्थ है उर्दू-शिक्षित। इस प्रकार इस नए उपनिवेश में विचित्र धारणा बनकर लोगों में हिंदी शिक्षा ग्रहण करने की इच्छा तो क्या, कल्पना भी शेष नहीं रही । जैसेजैसे पाठशालाओं की संख्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे उनमें उर्दू शिक्षा की ही परिपाटी चलने लगी । वास्तविक दृष्टि से देखा जाए तो हिंदी और जिसे उर्दू कहा जाता है, उसमें मूलत: कोई भेद नहीं है । हिंदी भाषा, फारसी लिपि में लिखो, बस हो गई उर्दू अत: वास्तव में मूलभूत प्रश्न लिपि का था। अंदमान में बंदियों तथा बाशिंदों की संख्या में मूलत: हिंदुओं की ही सतत भरमार होने के कारण और शिक्षा ग्रहणार्थ उन्हीं लोगों के अधिकांश आगे बढ़ने के कारण उन सभी को पाठशालाओं में पहले से ही हिंदी अर्थात् नागरी लिपि ही पढ़ानी चाहिए थी, जो राष्ट्रीय एकता एवं धार्मिक एकता की द्योतक तथा प्रिय है । परंतु आश्चर्य की बात यह है कि उन पाठशालाओं में, जो मुख्यत: हिंदुओं के करों पर चलाई जाती हैं, आज भी सही ढंग से हिंदी नहीं सिखाई जाती। हिंदू बालक अ, आ, क, ख, ग, नहीं जानते, 'तुलसी रामायण' अथवा ' भगवद्गीता ' के श्लोक वे नहीं पढ़ पाते, उन्हें पर्शियन कवियों के चुटकुले कंठस्थ होते हैं कालिदास तो रहने दीजिए, सूरदास अथवा प्रेमसागर की एक पंक्ति से भी वे परिचित नहीं होते-हिंदी की प्रथम पुस्तक उन्हें ग्रीक-लैटिन समान प्रतीत होती है । परंतु उर्दू समाचारपत्र वह बिना बाधा फर्राटे से पढ़ता है। उसके मस्तिष्क की उपमाएँ पर्शिया एवं अरेबिया स्थित नदियों से भरी रहती हैं । वहाँ के वीर पुरुष उन्हें ज्ञात हैं, परंतु पांडव क्या, महाभारत, रामायण अथवा भागवत का एक अक्षर भी उन्हें ज्ञात नहीं होता, न ही वे पढ़ सकते हैं । अंदमान के हमारे जैसे शिक्षित लोगों में से साधारण मनुष्यों की इस स्थिति का अवलोकन करने के बाद हमारी यही राय बनी कि अंदमान में हिंदू संस्कृति जीवित रखनी है तो हिंदी भाषा एवं नागरी लिपि की शिक्षा प्रत्येक हिंदू बच्चे को सर्वथा अपरिहार्य रूप में देने के लिए सतत आंदोलन छेड़ना अत्यावश्यक है।
प्रत्येक पाठशाला में हिंदी भाषा एवं नागरी लिपि शिक्षा का अनिवार्य माध्यम हो और जिस मुसलमान बच्चे अथवा अन्य लोगों को उर्दू लिपि और भाषा (अरबी, पर्शियन शब्द, प्राय: हिंदी) सीखनी है, उन्हें वह भाषा के रूप में विशेष विषय के रूप में पढ़ाई जाए। अंदमान के स्कूलों में यह व्यवस्था करने के लिए प्रथमत: लोगों में यह इच्छा उत्पन्न करना आवश्यक था।
क्योंकि वहाँ के हिंदू लोगों में सार्वजनिक एवं राष्ट्रीय एकता की भावना अत्यल्प थी और हिंदुत्व का अभिमान केवल मूर्खतापूर्ण रूढि के रूप में जीवित मात्र था। उन्हें इस बात का बिलकुल ज्ञान नहीं था कि हिंदी हिंदुओं की अपनी भाषा है और अपने धर्मग्रंथ, कम-से-कम प्राकृत, जिस नागरी में होते हैं वह लिपि तथा वह भाषा सीखना अपना परम पावन कर्तव्य है। दो-तीन पीढ़ियों से उर्दू के संपर्क से उसका केवल वर्चस्व ही नहीं, अपितु आत्मविनाशक अभिमान का भी उनमें संचार हुआ था। अतः बाहर हमारे विचारों के जो लोग थे, उन्होंने स्वतंत्र लोगों के घर-घर इस विषय की चर्चा करने और जागृति लाने का साहस से श्रीगणेश किया।
जिस अध्याय में हमने अंदमान के संगठन, शिक्षा, शुद्धिकरण आदि आंदोलनों का इतिहास इससे पूर्व दिया है, उससे बंदियों एवं बाशिंदों में समाचारपत्र, समाचार, राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रीय चर्चा, अंतःस्थ सभा तथा व्याख्यान आदि साधनों द्वारा पाठकों ने गौर किया ही होगा कि हमारी संस्था के प्रचारकों ने कितनी जागृति फैलाई । उन आंदोलनों में प्रथमत: ही ' स्वतंत्र' लोगों में हिंदी का प्रचार करना कर्तव्य था। इस योग से उन पाँच-छह वर्षों में स्वतंत्र लोगों में हिंदी से संबंधित विपुल जागृति आई।
कई परिवारों में हिंदी अध्यापक भिजवाकर हमने बच्चों को नागरी तथा हिंदी पढ़ाई। जब तेल कोठार का व्यवस्थापन हमारे पास आ गया तब व्यवसाय के बहाने जो स्वतंत्र लोग कारागृह में आते उनसे हमारा परिचय होने लगा। केवल हमें देखने अथवा मिलने के लिए कई स्वतंत्र लोग तेल और भूसी को खरीदते, ताकि कम-सेकम उसी बहाने कारागार में प्रवेश पाकर उस गोदाम में हमसे भेंट हो जाए। ऐसे सभी लोगों को अन्य उपदेशों के साथ यह भी उपदेश देते कि 'तुम लोग हिंदू हो, हिंदी तुम्हारी राष्ट्रभाषा नहीं तो कम-से-कम अंदमान में तो धर्मभाषा है । तुम्हें अपने बाल-बच्चों को तो हिंदी और नागरी लिपि अवश्य सिखानी होगी।
तुम सब मिलकर सरकार को एक आवेदनपत्र भेजो तो स्कूलों में हिंदी और नागरी अवश्य प्रारंभ होगी। परंतु जब तक वह प्रबंध नहीं होता तब तक तुम लोग अपने-अपने घरों में हिंदी पढ़ाओ।' हमारे स्वयंसेवक किसीके ' हाँ' कहते ही उसके घर में प्रकट रूप में अथवा अंतःस्थ रीति से जाकर हिंदी पढ़ाते, क्योंकि अंदमान में इच्छा होते हुए भी स्वतंत्र रूप में किसीके घर बिना अनुमति कोई भी बंदी सहसा नहीं जा सकता था। “स्वतंत्र को भी बंदी से बात करने अथवा किसी तरह के व्यवहार की स्वतंत्रता नहीं थी। हमें जो भी कोई मिलता, उससे हिंदी सीखने की प्रार्थना करते। मुंशी आया, चलो हिंदी सीखो; लेखक आया, हिंदी सीखो; डॉक्टर आया, हिंदी सीखो-इस तरह हमारा अविरल जाप होता रहता।
स्वतंत्र लोगों में हिंदी-शिक्षा का इस तरह थोड़ा-बहुत प्रसार होते ही उनके बच्चों के लिए हिंदी में महाभारत आदि पुस्तकें, शिवाजी आदि महापुरुषों के चरित्र निःशुल्क बाँटे जाते। उनके घर हिंदी समाचारपत्र पहुँचाकर उनसे पढ़वाए जाते। जो सिपाही, व्यापारी आदि लोग हमसे आखिर-आखिर में प्रत्यक्ष मिल सकते थे, उन्हे हम स्वयं हिंदी पढ़ाते। इस तरह प्रयास करते-करते स्वतंत्र लोगों में यह भावना प्रचुर मात्रा में बढ़ गई कि कम-से-कम अंदमान में तो प्रत्येक हिंदू का यह धार्मिक कर्तव्य है कि वह हिंदी सीखे और उस भावना के बलबूते पर वहाँ के स्कूलों में कम-सेकम हिंदू बालकों को तो हिंदी पढ़ाई जाए। इस प्रकार सरकार को आवेदन करने का प्रयास भी आरंभ हो गया।
परंतु यह देखकर कि जब तक सरकारी दफ्तर को भाषा उर्दू है, तब तक बच्चों की रुचि साधारणतः उर्दू सीखने की ओर अधिक होगी। तब जहाँ संभव था उस स्थान पर दफ्तर की भाषा ही हिंदी करने का हम प्रयास करने लगे। वास्तव में प्राय: सब सरकारी दफ्तर अंग्रेजी में ही होते।
जो उर्दू भाषा में होता, वह इसलिए नहीं कि उस तरह का कोई नियम था, अपितु था पहले-पहले उत्तरी क्षेत्र के हिदुस्थानी मुंशी आते रहने और बंदियों में भी उत्तर के उर्दू लिखित प्रांतों के लोगों की ही भरमार होने से वह एक परिपाटी या रूढ़ि बन गई। इस उर्दू भाषी दफ्तर में प्रमुख हिस्सा जहाज से जा रहे बंदियों की चिट्ठी-पत्रियों का होता। ये पत्र 'मुंशी' द्वारा लिखवाए जाने से प्राय: उर्दू में ही होते। अत: इस तरह अनुमति प्राप्त करने का प्रयास किया गया कि पत्र देशी भाषाओं में हों।
'मराठी', गुरुमुखी ' आदि भाषाओं में पत्र-व्यवहार करने के लिए अनुमति के प्रयास करने में कई दिन बीत गए, क्योंकि मुंशी अंग्रेजी अथवा उर्दू जानते थे और मुंशी द्वारा पत्र पर सम्मति मिले बिना उसे “उपयुक्त नहीं समझा जाता। अंत में जब यह अनुमति मिल गई कि बंदी अपनी प्रांतीय भाषा में पत्र लिख सकता है, तब पंजाब, लखनऊ आदि उन प्रांतों के, जहाँ उर्दू प्रचलित थी, हिंदू बंदी का मत परिवर्तन किया गया कि पत्र हमेशा हिंदी में ही भेजा जाए। मराठी, बंगाली आदि हिंदू बंदियों से अंत:स्थ रूप से जोर-शोर से यह कहने लगे कि या तो वे पत्र अपनी मातृभाषा में लिखें या हिंदी में, परंतु उर्दू में कदापि नहीं। अत: उच्च कार्यालय में यह देखने के लिए कि वह पत्र नियमानुकूल लिखे गए हैं या नहीं, ऐसे मुंशी नियुक्त किए गए जो हिंदी तथा अन्य देशी भाषा जानते थे। पुराने अधिकारी जो उर्दू जानते थे, स्वयं आगे बढ़कर हिंदी नागरी का ज्ञान संपादन करने लगे।
हिंदी पत्र लेखनार्थ मुंशी नहीं मिलने पर हमारे लोग वह काम स्वयं करते । इससे पूर्व हमारे कारागार में नब्बे प्रतिशत उर्दू में पत्र भेजे जाते थे, परंतु प्रयासों के चलते अंत में नब्बे प्रतिशत पत्र देशी भाषाओं में और विशेषत: हिंदी नागरी में जाने लगे। आगे चलकर उन लोगों में भी, जिन्हें मुंशी आदि को नियुक्त करने का अधिकार था, हिंदू संगठन के अभिमानी हिंदू लोग ही नियुक्त किए जाते।
उसी तरह ऐसे मुंशियों की नियुक्ति की जाती जो हिंदी जानते थे । हमारी संस्था के लोगों के प्रयासों से इस तरह अलिखित-स्वयं-सम्मान नियम ही हो गया कि हिंदू को पत्र हिंदी में ही लिखना चाहिए--अधिक-से-अधिक अपनी प्रांतीय हिंदू भाषा में। मुसलमान बंदी चाहे तो उर्दू में पत्र लिखें, उसपर कोई जबरदस्ती नहीं की गई। परंतु इससे पूर्व किसी भी बंदी को महाराष्ट्र में अथवा बंगाल में भी प्रायः जो उर्दू में ही भेजना अनिवार्य था, वह जबरदस्ती हमने तोड़ डाली।
जब हम कार्यालय में जाने लगे तब हम स्वयं सभी बंदियों के पत्रों को तलाशी लेकर देखते कि कहीं कोई हिंदू अकारण उर्दू में तो नहीं लिख रहा । तुरंत उसके पास जाकर हम उसका मत परिवर्तन करते | इस तरह करते-करते जगह-जगह पर हिंदू मुंशियों की, जो हिंदी जानते थे, नियुक्ति कराकर पत्र-व्यवहार बहुश: हिंदी में आरंभ कराया गया। वही बात आनेवाली डाक की थी। क्योंकि यह प्रयास हो रहा था कि प्रत्येक हिंदू बंदी अपने संबंधियों को लिखे कि उत्तर हिंदी में ही भेजा जाए। इससे आनेवाले पत्रों में हिंदू प्रांतीय भाषाओं तथा हिंदी में लिखे पत्रों की संख्या बढ़ने लगी | यह देखने के लिए कि वे सरकारी दृष्टि से उपयुक्त हैं या नहीं, हिंदी मुंशियों की आवश्यकता बढ़ गई। उर्दू का महत्त्व और प्रचार कम होने लगा।
केवल राजबंदियों का अंग्रेजी में ही पत्र भेजना लगभग अनिवार्य होता, क्योंकि उन पत्रों का स्वत: अंग्रेज अधिकारी अन्वेषण करते। आगे चलकर जब सैकड़ों राजबंदी यहाँ आ गए तब अनेक को अंग्रेजी न आने से पत्र स्वभाषा में भेजने की अनुमति--वह भी बहुत प्रयासों से--मिल गई। हमें अंत तक अंग्रेजी में पत्र भेजना अनिवार्य था।
जो स्थिति पत्र-व्यवहार की थी, वही टिप्पणियों, सरकारी कार्यालय तथा कार्यालयांतर्गत निम्न वर्गीय अधिकारियों के कार्यों, दैनिक, छिटपुट सरकारी पत्रव्यवहार और दफ्तर की भी हो गई | पहले यह सब उर्दू में था, परंतु जैसे-जैसे हिंदू “मुंशी' और अधिकारी उर्दू न लिखने का ब्रत लेने लगे वैसे-वैसे यह काम भी हिंदी में ही होने लगा। धीरे-धीरे उर्दू को निकालकर हिंदी एकमात्र लिपि नहीं हुई, तथापि ऐसा स्पष्ट प्रतीत होने लगा कि वह उसके साथ सम्माननीय सरकारी भाषा तथा लिपि होगी।
स्वतंत्र लोगों में शादी-ब्याह की पत्रिका भी हिंदू लोग उर्दू में छापते थे, परंतु इसके पश्चात् कई लोग हिंदी में छापने लगे। उन्हें पढ़ना भी कठिन हो रहा था, क्योंकि शिक्षित हिंदू केवल उर्दू-शिक्षित था। फिर भी वैसे ही प्रवाह चला कि अधिक-से-अधिक पत्रिकाएँ हिंदी और उर्दू--इस प्रकार दोहरे काजग पर छापी जाएँ। कम-से-कम उर्दू में ही छापी गईं तो ऊपर ॐ और नीचे कुछ नागरी वाक्यों को छापें और लिखें। बाद में इस प्रकार की परिपाटी प्रचलित हो गई।
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इतने सारे गोरखधंधों के चलते इसका विरोध भी हो ही रहा था, परंतु आश्चर्य यह कि न केवल मुसलमान अधिकारियों द्वारा विरोध हो रहा था, प्रत्युत अंग्रेज अधिकारियों द्वारा भी विरोध हो रहा था। वे हिंदी के विषय में सशंकित रहते। एक कारण यह था कि वे भी उर्दू जानते, हिंदी नहीं; और दूसरा कारण हिंदी के आंदोलन को हमारा प्रबल समर्थन था।
अत: वे नित्य सशंकित रहते | हिंदी पुस्तक मँगवाने के लिए हम एक बंदी को अनुकूल कर रहे थे कि 'तुम उर्दू पुस्तकें मँगवा रहे थे न, तो अब हिंदी क्यों मँगवाने जा रहो हो ' इस प्रकार उससे प्रश्न पूछकर उसका मत परिवर्तन करने के लिए भी एक अंग्रेज अधिकारी तत्पर था | जब पाठशालाओं में हिंदी पढ़ाने के लिए हमने स्वतंत्र आंदोलन छेड़ा और वह सफल होने लगा तब 'स्वतंत्र लोगों में हमारा नाम होगा और हमारा प्रभुत्व बढ़ जाएगा '--मुसलमान अधिकारी इस प्रकार की रिपोर्ट स्पष्ट रूप में गुप्तचर विभाग की पुलिस तथा उच्चाधिकारियों को भेजने लगे।
उन्हीं बंदियों ने मुख्यत: हिंदी का आंदोलन छेड़ा था जो आर्यसमाज, शुद्धि, राजनीति प्रचार, शिक्षा, अन्याय का प्रतिरोध आदि कार्यो में सतत नेतृत्व करते रहे थे और सरकारी दफ्तर में ' आंदोलनकारी, भयंकर संदेहास्पद व्यवहारवाले ' जैसे ढेर सारे उपपदों से गौरवान्वित थे। इस प्रकार सरकार के बिना किसी कारणवश संदेहास्पद दृष्टि से देखने से स्वतंत्र लोगों की माँग होने पर भी स्कूलों में हिंदू बालकों के लिए हिंदी को अनिवार्य करना असंभव हो गया। हमारे आने पर भी संभव नहीं हुआ। हम लोगों के मन पर सतत अंकित किया जा रहा था कि यदि वहाँ के स्वतंत्र लोग अविरत प्रयास करेंगे तो सरकार को यह बात ज्ञात होगी कि अपना संदेह निपट पागलपन है और वह अंदमान को पाठशालाओं में कम-से-कम हिदुंओं को तो हिंदी तथा नागरी अनिवार्य रूप में पढ़ाने की अनुमति देगी।
कन्याओं को हिंदी नागरी शिक्षा
यद्यपि लड़कों की पाठशालाओं में हिंदी, नागरी अनिवार्य नहीं की जा सकी, तथापि उसी दौरान स्थापित कन्या पाठशाला में उस आंदोलन को सफलता प्राप्त हो Te इन कन्याओं को भी उर्दू में ही शिक्षा दी जानेवाली थी । हिंदी का कुछ भी प्रबंध नहीं रखा गया था। परंतु समय पर ही स्वतंत्र लोगों को सतत लज्जित करके, चिढ़ाते , हुए कन्याओं को तो अलिफ, बे, पे आदि उर्दू वर्णमाला (हरूफ) पढ़ाने के लिए मुसलमान मौलवी के हाथों सौंपने की विघातक प्रवृत्तियों से विमुख किया गया और पहले से ही कन्या पाठशालाओं में हिंदू कन्याओं को हिंदी, नागरी पढ़ाने की व्यवस्था की गई | यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि राजबंदियों में भी पंजाब आदि प्रांतों
के लोगों ने उर्दू में पत्र न भेजते हुए अपनी हिंदी भाषा में भेजना आरंभ किया। राजबंदियों में पंजाबी आदि लोगों में उर्दू के अच्छे शायर एवं नामवर लेखक भी थे। उनमें से कइयों ने प्रथमतः सहज भाव से ही हमारे विरुद्ध आंदोलन का प्रतिकार किया, परंतु आगे चलकर राष्ट्रभाषा की दृष्टि से किस तरह उर्दू अपनी साख जमाना चाहती है, आदि युक्ति, तर्क, उनके गले उतारे, तब उनमें से कुछ लोगों ने हमारे सामने ' आज से यह उर्दू कलम तोड़ दी, ' इस प्रतिज्ञा के साथ हिंदी में लिखना आरंभ किया। उन्हें प्रथमतः ' आकाश, व्यायाम' आदि सरल शब्द भी सिखाने पड़े, इतना उनका मन उर्दू ने अहिंदू कर छोड़ा था। परंतु उन्होंने उन कष्टों को झेला और उच्च नागरी हिंदी सीखते गए।
मेरा यह आंदोलन उर्दू के प्रति विद्वेष भावना से नहीं छेड़ा गया था, क्योंकि मैं स्वयं उदू सीख रहा था और पढ़ता भी था। आज भी साधारण टफ तक उर्द मैं पढ़ सकता हूँ । काफी समझ भी सकता हूँ । वह एक लिपि और किंचित् उपभाषा के रूप में हिंदू-मुसलमानों में सूखे नैन जीवित रहे । हमारे मुसलमान देशबंधुओं में से कुछ लोगों की भाषा होने से हम भी उसका आंशिक ममतापूर्वक जतन करेंगे। परंतु हिंदुओं के परिश्रम तथा प्रोत्साहन से वह इतनी नकचढ़ी हो जाए कि हिंदुओं को ही “हिंदी भाषा छोड़ो और मुझे अपनी राष्ट्रभाषा बनाओ' कहते हुए धमकाए, धौंस दिखाए, यह हम कदापि सहन नहीं करेंगे।
बस, यहाँ तक ही हम उसका प्रतिशोध करेंगे। अपने व्यय से चलाई हुई पाठशालाओं में हिंदुओं की उनकी अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी अनिवार्यत: पढ़ाए जाने और इस माँग के न्यायसंगत प्रतीत होने तथा उर्दू का बलपूर्वक थोपना अन्याय तथा परिणामत: हिंदू संस्कृति के लिए विघातक प्रतीत होने से हम यथासंभव उर्दू का उच्चाटन करते रहे । भाषा अथवा लिपि की दृष्टि से कोई भी हिंदू उर्दू सीखे। जैसे हम फ्रेंच, जर्मन पढ़ते हैं वैसे ही उर्दू भी सीखें, परंतु राष्ट्रभाषा अथवा स्वभाषा के रूप में अपनी संस्कृतोत्पन्न तथा पूर्वजों की हिंदी भाषा त्यागकर उर्दू को अपने सिर पर नचाना, उसे मुँहजोर बनाना हमें अनिष्टप्रद प्रतीत होता है।
अंदमान में हिंदी पुस्तकों की भरमार करते हुए चलते-फिरते गोपनीय ग्रंथालय कैसे थे, इसका संक्षिप्त वर्णन पीछे ग्रंथालय प्रकरण में आया ही है। चलते-फिरते इस ग्रंथालय में हिंदी अर्थशास्त्र, राजनीति, राजनीतिक आंदोलन आदि नवीनतम पुस्तकें सतत आती रहती थीं, जिससे साधारण बंदियों के लिए न केवल प्रचलित वरन् उच्च विषयों का ज्ञान भी बहुत कुछ सुलभ होता गया।
“सत्यार्थ प्रकाश" ग्रंथ के पठन को ओर तो हम नित्य ही विशेष ध्यान देते । राजबंदियों से उसे बार-बार पढ़वाते। इसमें कोई संदेह नहीं कि दयानंद का यह ग्रंथ कुछ तात्कालिक संग्राम से उड़ी धूल तथा धुएँ का अंश छोड़कर एक अदम्य तथा निर्भीक प्रचारक ही है, जो मन पर हिंदू संस्कृति के उच्च तत्त्व अंकित करते हुए हिंदू धर्म का राष्ट्रीय स्वरूप व्यक्त करता है।
हिंदी पढ़ने में प्रवृत्त करने के लिए कभी-कभी हम वहाँ के बंदियों तथा उर्दू-शिक्षित स्वतंत्र युवकों को छात्रवृत्तियाँ भी प्रदान करते। यद्यपि प्रथम पैसे लो, पर सीखो अवश्य, इस तरह का आंदोलन छेड़ना पड़ा, तथापि आगे हिंदी की रुचि इतनी बढ़ गई कि पुस्तकें ही पूरी नहीं पड़ती थीं। यह शिकायत बंद हो गई कि पुस्तकें धूल में सनी यूँ ही व्यर्थ पड़ी हैं। अब यह चुगली कानों में पड़ने लगी कि लगातार लोगों के हाथों में जाती हुई पुस्तक मैली हो जाती है । मैं कहता--यह सुनने से कि पुस्तक व्यर्थ पड़ी है, मुझे यह शिकायत सुनना अधिक अच्छा लगता है कि वह पढ़-पढ़कर फट रही है।
जिस अंदमान के घर-घर में उर्दू हिंदू लोगों के मन कुतर-कुतरकर उन्हें इतना खोखला बना रही थी कि हिंदू कन्याएँ भी आपस में पूछतीं, ' तुम्हारी शादी है ?' परंतु लगन, विवाह आदि शब्दों का अर्थ उनके पल्ले नहीं पड़ता था, उसी अंदमान में अब हिंदी भाषा तथा नागरी लिपि हमारी धर्मभाषा एवं धर्मलिपि है, यह भावना हिंदू जनता में बच्चों तक दृढ़मूल हो गई तथा हिंदी पढ़ने में रुचि बढ़ने लगी। यह बात जिस अवस्था में आंदोलन छेड़ना पड़ा, उस अवस्था की तुलना में इसमें कोई संदेह नहीं कि जिन्होंने यह चालू रखने में प्रमुख हिस्सा लिया--कारागृह तथा उपनिवेश के उन उत्साही बंदीवान प्रचारकों के लिए भूषणास्पद, गौरवास्पद थी।
परंतु उस आंदोलन का संपूर्ण फल हाथ लगने के लिए वहाँ के शिक्षा विभाग द्वारा ही हिंदी नागरी का प्रचार होना आवश्यक था | उसका सूतोवाच हमने करवाया था। आगे दखेंगे--इसका क्या हुआ।
- वीर सावरकर
(स्रोत: प्रस्तुत लेख वीर सावरकर की पुस्तक "मेरा आजीवन कारावास" से है।)
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