Friday, October 16, 2026

एक उम्र का वीराना


निष्ठुर-सा, नश्वर-सा ये जीवन, 
तुम बिन वीरान लगता है,
 हर साँस में इक टीस-सी उठती,
 हर लम्हा सुनसान लगता है।

क्या सावन की रिमझिम बूँदें, 
क्या भादों के मोती-से जल, 
तुम बिन हर मौसम अश्कों-सा
हर मंज़र श्मशान लगता है।

न अब बादलों में कशिश कोई, 
न बारिश में वो रवानगी, 
तुम बिन इस दिल का हर मक़सद, 
बस अवसाद का सामान लगता है।

जिस दुनिया में तुम ही न हो, 
उस दुनिया से क्या वास्ता, 
तुम बिन ये जीवन जीना भी, 
इक उम्र-भर का वीरान लगता है।।

-  सतीश यादव 

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