निष्ठुर-सा, नश्वर-सा ये जीवन,
तुम बिन वीरान लगता है,
हर साँस में इक टीस-सी उठती,
हर लम्हा सुनसान लगता है।
क्या सावन की रिमझिम बूँदें,
क्या भादों के मोती-से जल,
तुम बिन हर मौसम अश्कों-सा
हर मंज़र श्मशान लगता है।
न अब बादलों में कशिश कोई,
न बारिश में वो रवानगी,
तुम बिन इस दिल का हर मक़सद,
बस अवसाद का सामान लगता है।
जिस दुनिया में तुम ही न हो,
उस दुनिया से क्या वास्ता,
तुम बिन ये जीवन जीना भी,
इक उम्र-भर का वीरान लगता है।।
- सतीश यादव