Sunday, June 7, 2026

पंख नहीं, पाँव हैं तुम्हारे

चिड़िया तो उड़ जाएगी
 आंगन में वक्त तो 
तुम भी नहीं बिताते
 गलत सही कुछ नहीं जताते
 तमन्ना तुम्हारी उड़ने की है
घर उजड़ने की सोचते कहां हो 
चिड़िया भी उड़ जाती है और 
घोसला उजड़ जाता है...
ये तो फिर भी पक्षी है 
तुम्हारी समझ तो अच्छी है
इसे मिलेंगे तमाम पेड़ 
तुम किसकी काटोगे मेड़?
कभी सोचा है 
चिड़िया भी सोचती है
 हर मौसम में
घोंसला बदलती है
तुम तो मनुष्य हो सभ्य हो 
कहा जाओगे सब छोड़
भटगो दर बदर 
जड़े तो तुम्हारी पूर्वजों की
 विशेष स्थान में ही बसती हैं
जड़ से उखड़ता है पेड़ तो
 चिड़िया उड़ जाती है सब छोड़, 
तुम सोचे हो जड़ उखड़ेगा तो 
जाओगे किस ओर मोड़... 
अरे थम जाओ 
आहिस्ते चलो
 उड़ना नहीं है, 
पैदल चलना सीखो, 
पंख नहीं पाँव हैं तुम्हारे, 
समझे प्यारे।।

5 comments:

  1. आपकी कविता बहुत गहरी बात कहती है। आज की भागदौड़ में लोग उड़ने की चाह में अपनी जड़ों, अपने घर और रिश्तों की अहमियत भूल जाते हैं। चिड़िया हर मौसम में नया घोंसला बना लेती है, लेकिन इंसान के लिए अपनी मिट्टी और अपने लोग ही उसकी असली पहचान होते हैं।

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